किसी भी कार्य का आरम्भ सर्वप्रथम आकांक्षा के रूप में होता है।

किसी भी कार्य का आरम्भ सर्वप्रथम आकांक्षा के रूप में होता है। आकांक्षा उठते ही उसकी पूर्ति के लिए मस्तिष्क कल्पना द्वारा उसके लिए योजना बनाने लगता है। बुद्धि आकांक्षा पूर्ति का उपाय खोजती है और विचार-चिंतन के रूप में कर्म का बीजारोपण होने लगता है।
उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति धनवान और साधन संपन्न बनने की आकांक्षा रखता है तो उसके विचार, उसकी बुद्धि और उसका मस्तिष्क आकांक्षा के साथ ही सक्रिय हो उठेंगे। यदि उपलब्ध साधन ही पर्याप्त जँचते हैं और अधिक धनसंग्रह की इच्छा नहीं उठती तो बुद्धि और विचार उधर जायेंगे भी नहीं।

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क्रोध के दो मिनट

जीवन के दो मिनट जो दुःखों से बचाकर सुख की बरसात कर सकते हैं. वे क्रोध के दो मिनट हैं। भागवत में भी यही संदेश दिया गया है. कहा गया है कि यदि तुम्हारे काम से किसी का अपकार होता है तो उस काम को एक दिन के लिए टाल दो. यदि उपकार होता हो तो तुरंत करो ताकि कहीं उपकार का विचार न बदल जाए।

सद्गुणों का अर्थ सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, ईश्वर- भक्ति जैसे उच्च आदर्शों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। उनकी परिधि अन्तरंग और बहिरंग जीवन के प्रत्येक क्षेत्र तक फैली हुई है ।। समग्र व्यक्तित्व को परिष्कृत, सज्जनोचित एवं प्रामाणिक बनाने वाली सभी आदतों एवं रुझानों को सद्गुणों की सीमा में सम्मिलित किया जाएगा ।। कोई व्यक्ति झूठ नहीं बोलता, चोरी नहीं करता, व्यभिचार से बचा है, यह बचाव उचित है और अनुकरणीय भी, पर इतने को ही आत्म- निर्माण मान बैठना अपर्याप्त होगा ।।

नित्य स्वाध्याय की नियमित व्यवस्था रखनी चाहिए।

नित्य स्वाध्याय की नियमित व्यवस्था रखनी चाहिए। स्वाध्याय का विशय केवल एक होना चाहिए- आत्म निरीक्षण एवं आत्म परिशोधन का मार्गदर्शन जो पुस्तकें इस प्रयोजन को पूरा करती है, आन्तरिक समस्याओं के समाधान में योगदान करती है केवल उन्हें ही इस प्रयोजन के लिए चुनना चाहिए। कथा पुराणों का उपयोग इस प्रसंग में निरर्थक है। आज की गुत्थियों को- आज की परिस्थितियों में- आज के ढंग में किस तरह सुलझाया जा सकता है- सो उसका दूरदर्शिता पूर्ण हल प्रस्तुत करे वही उपयुक्त स्वाध्याय साहित्य है। ऐसी पुस्तकों को हमें छाँटना और चुनना पड़ेगा उन्हें नित्य नियमित रूप से गंभीरता और एकाग्रतापूर्वक पढ़ने के लिए समय नियत करना पड़ेगा अन्तः करण की भूख बुझने के लिए यह स्वाध्याय साधना नितान्त आवश्यक है।

गुरुभक्त शिष्यों को इसकी अनुऊपर के मंत्रों में गुरुभक्त शिष्यों को इसकी अनुभूति कराने की चेष्टा की गयी है। इसमें बताया गया है कि शिष्य का परम कर्त्तव्य है कि वह अपने सद्गुरु को नमन करें, क्योंकि वही संसार वृक्ष पर आरूढ़ जीव का नरक सागर में गिरने से उद्धार करते हैं। नमन उनश्री गुरु को, जो अपने शिष्य के लिए ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर होने के साथ स्वयं परब्रह्म परमेश्वर हैं। शिव रूपी उन सद्गुरु को नमन करना शिष्य का परम कर्त्तव्य है, जो समस्त विद्याओं का उदय स्थान और संसार का आदि कारण हैं और संसार सागर को पार करने के लिए सेतु हैं। वे गुरुदेव भगवान् ही अज्ञान के अन्धकार से अन्धे जीव की आँखों को ज्ञानाञ्जन की शलाका से खोलते हैं। गुरुवर ही अपने शिष्य के लिए पिता हैं, माता हैं, बन्धु हैं और इष्ट देवता हैं। वे ही उसे संसार के सत्य का बोध कराने वाले हैं। ऐसे परम कृपालु सद्गुरु को शिष्य बार-बार नमन करे और करता रहे

धर्म सही मार्ग बताता है ।

धर्म तपस्या को ही सर्वोपरि नहीं मानता, न शारीरिक सुखों के निष्प्रयोजन, परित्याग को महत्त्व देता है । वह जीवन को आनन्दमय देखना चाहता है । आनन्द इन्द्रिय ग्राह्य भी हो सकता है और आत्मिक भी । इस तरह का कोई भी आनन्द धर्म की मर्यादा में निन्दनीय नहीं है । इसी तरह धन-सम्पत्ति आदि भी अपने आप में कोई पाप नहीं है । धर्म इसके लिए रोक नहीं लगता, लेकिन धन संग्रह करने के उपायों से किसी दूसरे का अहित होता हो तो वह धर्म की दृष्टी से निन्दनीय है । धर्म इस तरह के प्रयत्नों को बुरा बताकर उन पर रोक लगता है और सही मार्ग बताता है ।

उत्तरदायित्व का वजन उठाना

जिम्मेदारियाँ दूसरों पर डालने की इच्छा इसलिए होती है कि उत्तरदायित्व का वजन उठाना कायर और कमजोरों को बहुत भारी प्रतीत होता है। वे पगडंडी ढूँढ़ते हैं और ऐसे सरल रास्ते बच निकलने की बात सोचते हैं जिसमें अपने ऊपर कुछ बोझ न पड़े पर वस्तुतः इसमें भटकाव के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं। उत्थान और पतन का ही नहीं।, सुख और दुःख का उत्तरदायित्व भी हमें अपने ऊपर लेना चाहिए और सफलता असफलता की अपनी ही जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए। हम अपने भाग्य के निर्माता स्वयं है। वर्तमान में जो परिस्थितियाँ सामने खड़ी है उनमें यत्किंचित् दूसरे भी निमित्त हो सकते हैं पर अधिकतर अपनी ही रीति-नीति और गतिविधियों की प्रतिक्रिया सामने रहती है। भविष्य में भी जो कुछ होना या बनना है उस में भी अपने ही क्रिया-कलापों के प्रतिफल सामने होगे। दूसरों का सहयोग अवरोध एक सीमा तक ही हमारा भला बुरा कर सकता है। तथ्य यह है कि अपना व्यक्तित्व ही हर दिशा में प्रतिध्वनि की तरह गूँजता है।