समर्पण, श्रमशीलता के साथ शिष्य को हर पल जागरूक भी रहना जरूरी है।

समर्पण, श्रमशीलता के साथ शिष्य को हर पल जागरूक भी रहना जरूरी है। उसे हमेशा सजग रहना पड़ता है कि कहीं कोई दुराचार, कोई बुरा भाव तो उसके अन्तःकरण में नहीं पनप रहा। कोई पाप तो उसकी अन्तर्चेतना में नहीं अंकुरित हो रहा। यद्यपि श्रद्धालु शिष्य में इसकी सम्भावना कम है, परन्तु वातावरण का कुप्रभाव कभी भी किसी पर भी हावी हो सकता है। इस समस्या का समाधान सूत्र एक ही है- अपने प्रति कठोरता, दूसरों के प्रति उदारता। औरों के प्रति हमेशा प्रेमपूर्ण व्यवहार करने वाले साधक को अपने प्रति हमेशा ही कठोर रहना पड़ता है। हमेशा ही अपने बारे में सावधानी बरतनी पड़ती है।

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उपासना की सफलता का एक मात्र कारण है

उपासना की सफलता का एक मात्र कारण है आत्मिक प्रगति की पहली मंजिल ‘साधना’ की उपेक्षा। गुण-कर्म स्वभाव का परिष्कार साधना का मूलभूत उद्देश्य है। उसका स्वरूप है आत्म-बोध, आत्म-चिन्तन, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण, आत्म-विकास। यही आत्म देव का सच्चा पंचोपचार पूजन है। जो उसे कर सकता है उसी की पूजा उपासना सफल होती है। निराकार निर्विकार परमेश्वर की साकार प्रतिमा उपासना को व्यावहारिक रूप देने के लिए बनाई जाती है। इसी प्रकार जल, दीप, नैवेद्य, पुष्प, चन्दन के पंच विधि पूजा उपकरण प्रयुक्त किये जाते हैं। इस देवार्पण के पीछे जीवन साधना की ओर इंगित करने वाला गहन तत्वज्ञान सन्निहित है।

पाप और पुण्य का उचित और अनुचित

पाप और पुण्य का उचित और अनुचित का अन्तर उनका दंड पुरस्कार ही मानव-समाज के भौतिक मेरुदंड को सीधा रखे हुए है। यदि उसे ही तोड़ दिया जाय तो फिर व्यक्ति और समाज की आचार संहिता का ईश्वर ही रक्षक है। पूजा उपासना का प्रयोजन मनुष्य को ईश्वर- विश्वासी अर्थात् धर्म मर्यादाओं का पालन करने के लिए व्रत-बन्ध धारण किये रहने वाला है। यदि पूजा पाप-दंड से मुक्ति दिलाती है तो फिर यही कहना पड़ेगा कि वह नैतिक, मानवीय धार्मिक और आत्मिक मूलभूत आधारों को ही नष्ट करेगी। ऐसी दशा में यह पूजा वस्तुतः नास्तिकता से भी महंगी पड़ेगी, पिछले दिनों यही हुआ है यही बताया सिखाया गया है।

शिष्यत्व तो समर्पण की साधना है

शिष्यत्व तो समर्पण की साधना है- जिसका एक ही अर्थ है- अहंकार का अपने सद्गुरु के चरणों में विसर्जन। हालांकि इस समर्पण- विसर्जन के साथ भी कई तरह के भ्रम जनमानस में व्याप्त हैं। कई लोगों का सोचना है कि जब हमने समर्पण कर दिया- तब हम फिर कुछ काम क्यों करें? जब तृष्णा नहीं सुख की लालसा नहीं तब फिर मेहनत किसलिए? ये सवाल दरअसल भ्रमित मन की उपज है। जो जानकार हैं, समझदार हैं वे जानते हैं कि समर्पण और श्रद्धा का मतलब- निकम्मापन या निठल्ले बैठे रहना नहीं है। बल्कि इसका अर्थ है- सत्य के लिए, अपने गुरुदेव के लिए स्वयं को सम्पूर्ण रूप से झोंक देना।

यह अनुभव सभी महान् शिष्यों का है।

यह अनुभव सभी महान् शिष्यों का है। शिष्य के जीवन में तृष्णा और सुख की लालसा की कोई जगह नहीं है। मजे की बात है कि तृष्णा और सुख की लालसा किसी को भी सुखी नहीं कर पाती, हालांकि प्रायः सभी इसमें फँसे- उलझे रहते हैं। ऐसे लोगों के लिए जीवन आज में नहीं है, आने वाले कल में है। भविष्य में जीवन को खोजने वाले अपने वर्तमान से हमेशा असन्तुष्ट, असंतृप्त बने रहते हैं। इस सच्चाई का एक पहलू और भी है, जो तृष्णा और सुख की लालसा से अपने आप को जितना भरता जाता है- वह उतना ही अपने अहंकार को तुष्ट और पुष्ट करता रहता है। जबकि अहंकार का शिष्यत्व की साधना से कोई मेल नहीं है।

इस चिन्ता से तथाकथित धर्म गुरुओं के रचे भोंडे फूहड़ ग्रन्थ मुक्ति दिला देते हैं। उनका कहना है अमुक माला जपने वाले या अमुक पूजा अर्चा करने वाले को पाप कर्मों के दण्ड भुगतने से छुटकारा मिल जाता है। यह बहुत बड़ी बात है। यदि दण्ड का भय न रहे तो फिर पाप कर्मों द्वारा प्राप्त हो सकने वाले लाभों को छोड़ने को कोई कारण ही नहीं रह जाता। इस प्रकार उपरोक्त आश्वासनों पर विश्वास करने वाले यह मान बैठते हैं कि उनके पाप कट गये। अब वे कुकर्मों के दण्ड से पूर्णतया छुटकारा पा चुके। भूतकाल में किये हुये या भविष्य में किये जाने वाले पापों के दण्ड से वह देवता या मन्त्र बचा लेगा कि जिसे थोड़ा-सा जप, स्तवन, पूजन आदि करके या किसी दूसरे से कराके सहज ही बहकाया, फुसलाया और अनुकूल बनाया जा सकता है।

शिष्य संजीवनी का सेवन

शिष्य संजीवनी का सेवन (मनन- चिन्तन) जिन्होंने भी किया है- वे इसके औषधीय गुणों को अनुभव करेंगे, यह सुनिश्चित है। अपने व्यक्तित्व में उन्हें नए परिवर्तन का अहसास होगा। कुछ ऐसा लगेगा- जैसे अन्तःकरण में कहीं शिष्यत्व की मुरझाई- कुम्हलायी बेल फिर से हरी होने लगी है। निष्क्रिय पड़े भक्ति एवं समर्पण के तत्त्वों को सक्रियता का नया उछाह मिल गया है। आन्तरिक जीवन में भावान्तर की अनुभूति उन सबको है- जो इस अमृत औषधि को ले रहे हैं। इन सभी की अनुभूतियों में निखरा हुआ शिष्यत्व बड़ा ही स्पष्ट है।