पति की आर्थिक कमी अथवा कम कमाई की आलोचना तो कभी करनी ही नहीं चाहिये। जहाँ तक संभव हो ऐसी-व्यवस्था रखिये कि उसका आभास कम से कम ही हो। पति की आर्थिक आलोचना करने का अर्थ है उसका मन अपनी ओर से विमुख कर देना। बाजार अथवा बाहर जाते समय अपनी फरमाइश की सूची पेश करने और आने पर उनके लिए तलाशी लेने लगने का स्वभाव पति को रुष्ट कर देने वाला होता है।

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बौद्ध साहित्य में सामूहिक जिम्मेदारी के आभाव का एक अच्छा प्रसंग आता है।

बौद्ध साहित्य में सामूहिक जिम्मेदारी के आभाव का एक अच्छा प्रसंग आता है। किसी प्रदेश के राजा ने कोई धार्मिक अनुष्ठान करने के लिए राजधानी के निवासियों को निर्देश दिया कि सभी लोग मिलकर नगर के बाहर तैयार किये गए हौज में एक-एक लोटा दूध डालें। हौज को ढक दिया गया था और निश्चित समय पर जब हौज का ढक्कन हटाया गया तो पता चला कि दूध के भरने के स्थान पर हौज पानी से भरा था। कारण का पता लगाया गया तो मालूम हुआ कि प्रत्येक व्यक्ति ने यह सोच कर दूध के स्थान पर पानी डाला था कि केवल मैं ही पानी डाल रहा हूँ अन्य और लोग तो दूध ही डाल रहे हैं।

सन्तोष का अर्थ यह नहीं है कि हम हाथ पर हाथ रखकर बैठ जायें

सन्तोष का अर्थ यह नहीं है कि हम हाथ पर हाथ रखकर बैठ जायें और गाने लगें ‘अजगर करै न चाकरी पंछी करै न काम’ वास्तव में सन्तोष का अर्थ है प्रगति पथ पर धैर्य पूर्वक चलते हुए मार्ग में आने वाले कष्टों और कठिनाईयों का प्रभाव अपने ऊपर न पड़ने देना। संसार के कांटे हम नहीं बीन सकते किन्तु यदि हमने सन्तोष रूपी जूते पहन रखे हैं, तो कोई भी कांटा हमारे मार्ग में बाधक नहीं बन सकता।

जीवन एक बड़ी संपदा है

जीवन एक बड़ी संपदा है, लेकिन आदमी सिवाय उसे फेंकने और गंवाने के कुछ भी नहीं करता है! जीवन क्या है, यह भी पता नहीं चल पाता और हम उसे फेंक देते हैं! जीवन में क्या छिपा था–कौन से राज, कौन सा रहस्य, कौन सा स्वर्ग, कौन सा आनंद, कौन सी मुक्ति–उस सबका कोई भी अनुभव नहीं हो पाता और जीवन हमारे हाथ से रिक्त हो जाता है!

गुरू रूपी प्रकाश किसी को मिल जाता है तो शेष जीवन तो संवर ही जाता है।

किसी का सामना करना कठिन होता है

किसी का सामना करना कठिन होता है, क्योंकि कई बार इस का परिणाम यह होता है कि व्यक्ति संताप में डूब जाता है। आप जिस से टकराव कर रहे हैं वह व्यक्ति असहमति प्रकट कर सकता है, विरोध कर सकता है, अथवा यदि वह ईमानदार हो तो क्षमा भी मांग सकता है। परंतु यह संवाद कभी भी इतना सरल एवं सुखद नहीं होता। यह संवाद दो दलों या सरकारों के बीच हो सकता है, या फिर पती-पत्नी, माता-पिता और संतान, दो मित्र या एक प्रबंधक एवं कार्यकर्ता के बीच हो सकता है।

क्या बुद्धि का विकास बचपन में ही संभव है?

क्या बुद्धि का विकास बचपन में ही संभव है? उत्तर में कहना चाहिए कि आरंभिक काल की शिक्षा अवश्य ही महत्वपूर्ण एवं सरल है। इनमें बीस वर्ष की आयु तक जो संस्कार जम जाते हैं, वे अगले चार-पाँच वर्षो में पुष्ट होकर जीवन भर बने रहते हैं। उनमें परिवर्तन कठिनाई से और कम होता है, फिर भी यह बात असंभव नहीं कि बड़ी उम्र में भी किसी नवीन विषय में योग्यता प्राप्त की जाए। वर्षा ऋतु में बीज बोने पर बिना परिश्रम के फसल आ जाती है, किंतु अन्य ऋतुओं में पानी आदि की विशेष व्यवस्था करके फसल प्राप्त होती है। बड़ी आयु में किसी विषय की योग्यता प्राप्त करने के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि उस विषय में आंतरिक उत्कंठा और तीव्र इच्छा हो।

मुक्ति का अर्थ होगा बन्धनों से छूटना ।

मुक्ति का अर्थ होगा बन्धनों से छूटना । विचार करना है कि कौन से बन्धन हैं जिनसे हम बॅंधे हैं, शरीर को रस्सों से तो किसी ने जकड़ नहीं रखा है फिर मुक्ति किससे ? मुक्ति वस्तुत: अपने दोष-दुर्गुणों से, स्वार्थ-संकीर्णता से, क्रोध-अंहकार से, लोभ-मोह से, पाप-अविवेक सेप्राप्त करनी चाहिए । यह अंतरंग की दुर्बलता ही सबसे बड़ा बन्धन है। स्वर्ग और मुक्ति अपने दृष्टिकोण को परिष्कृत करके हम इसी जीवन में प्राप्त कर सकते हैं, इसके लिए मृत्यु काल तक की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं ।