माँ दुर्गा की चौथी शक्ति का नाम कूष्मान्डा है।

माँ दुर्गा की चौथी शक्ति का नाम कूष्मान्डा है। अपनी मंद हंसी से ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्मान्डा कहा जाता है। यह सृष्टि की आध शक्ति है। माँ कूष्मान्डा के स्वरूप को ध्यान में रखकर आराधना करने से समस्त रोग और शोक नष्ट हो जाते हैं।

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माँ दुर्गा की तीसरी शक्ति माता चन्द्रघंटा की पुजा अर्चना की जाती है।

नवरात्र के तीसरे दिन माँ दुर्गा की तीसरी शक्ति माता चन्द्रघंटा की पुजा अर्चना की जाती है। माँ चन्द्रघंटा की उपासना से भक्तों को भौतिक, आत्मिक, आध्यात्मिक सुख और शांति मिलती है। माँ की उपासना से घर-परिवार से नकारात्मक ऊर्जा यानि कलह और अशांति दूर होती है। माँ चन्द्रघंटा का स्वरूप अति भव्य है। माँ सिंह यही शेर पर प्रसन्न मुद्रा में विराजमान होती है। दिव्य रुपधारी माता चन्द्रघंटा की दस भुजाएँ हैं। माता का स्मरण करते हुये साधकजन अपना मन मणिपुर चक्र में स्थित करते हैं। माँ चन्द्रघंटा नाद की देवी है। इनकी कृपा से साधक को अलौकिक दिव्य दर्शन एवं दृष्टि प्राप्त होती है। साधक के समस्त पाप-बंधन छुट जाते हैं।

माता ब्रह्मचारिणी दुर्गा का दूसरा रूप है।

माता ब्रह्मचारिणी दुर्गा का दूसरा रूप है। इस स्वरूप की उपासना से ताप, त्याग, वैराग्य सदाचार तथा विवेक की वृद्धि होती है। वह समस्त लोक के चर और अचर जगत की विद्याओं की ज्ञाता हैं। माता ब्रहंचारिणी की पुजा और साधना करने से कुंडलिनी शक्ति जागृत होती है। ऐसा भक्त इसलिए करते हैं ताकि उनका जीवन सफल हो सके और अपने सामने आने वाली किसी भी प्रकार की बाधा का सामना आसानी से कर सकें।

हिमालय पुत्री – शैलपुत्री

नवरात्र के पहले दिन माँ के रूप शैलपुत्री की पुजा की जाती है। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा। मटा शैलपुत्री का स्वरूप अति दिव्य है। माँ के दाहिने हाथ में त्रिशूल और माँ के बाएँ हाथ में कमाल का फूल सुशोभित है। माँ शैलपुत्री बैल पर सवारी करती हैं। माँ को समस्त वन्य जीव-जंतुओं का रक्षक माना जाता है। इनकी आराधना से आपदाओं से मुक्ति मिलती है। इसलिए दुर्गम स्थानो पर बस्तियां बनाने से पहले माँ शैलपुत्री की स्थापना की जाती है।

हम अपने आपको आस्तिक समझे बैठे हैं।

भारत के जीवन में जब जब आस्तिकता का जमाना रहा है, वह हमेशा खुशहाल रहा है लेकिन जैसे जैसे उसकी उपेक्षा की जाती रही है उसकी खुशहाली हटती गई है। आज कलह और क्लेशों से भरा हुआ भारत हम सब की आस्तिकता का डिमडिम घोष कर रहा है और फिर भी हम अपने आपको आस्तिक समझे बैठे हैं।

आज की दुनिया रागद्वेष से पूर्ण है।

आज की दुनिया रागद्वेष से पूर्ण है। ऊंच नीच के भावों से भरी हुई है। यद्यपि मन्दिर मस्जिद और गिरजाघरों की संख्या बराबर बढ़ रही है लेकिन आस्तिकता की सब ओर उपेक्षा की जा रही है। हम कहने को तो आस्तिक बनते हैं लेकिन हृदय में उसके लिए कोई स्थान नहीं है। इस तरह हमारा जीवन आत्म प्रवञ्चना से भरा हुआ है। हम अपने आपको धोखा दे रहे हैं या अपनी समझ को लेकर हम धोखा खा रहें हैं धोखे का यह जीवन आस्तिक जीवन नहीं है इसे भी समझने वालो की संख्या उत्तरोत्तर बढ़ रही है।

आस्तिक की न अपनी कोई कामना होती है,

आस्तिक की न अपनी कोई कामना होती है, न माँग। वह न किसी से ऊंचा होता है न नीचा, न बड़ा न छोटा, न पवित्र न अपवित्र। उसको किसी प्रकार का अभाव नहीं सताता ।