अस्तु आत्मबल से संबंधित सिद्धियाँ और आत्म-कल्याण के साथ जुड़ी हुई विभूतियाँ प्राप्त करने के लिए जो वस्तुतः निष्ठावान हों उन्हें अपने गुण-कर्म स्वभाव पर गहरी दृष्टि डालनी चाहिए और जहाँ कहीं छिद्र हों उन्हें बन्द करना चाहिए। फूटे हुए बर्तन में जल भरा नहीं रह सकता- छेद वाली नाव तैर नहीं सकती, दुर्बुद्धि और दुश्चरित्र व्यक्ति इन छिद्रों में अपना सारा उपासनात्मक उपार्जन गँवा बैठता है और उसे छूँछ बनकर खाली हाथ रहना पड़ता है।

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उपासना कारतूस है और जीवन साधना बन्दूक।

उपासना कारतूस है और जीवन साधना बन्दूक। अच्छी बन्दूक होने पर ही कारतूस का चमत्कार देखा जा सकता है। बन्दूक रहित अकेला कारतूस तो थोड़ी आवाज करके फट ही सकता है उससे सिंह व्याघ्र का शिकार नहीं किया जा सकता। अनैतिक गतिविधियाँ और अवाँछनीय विचारणायें यदि भरी रहें तो कोई साधक आत्मिक प्रगति का वास्तविक और चिरस्थायी लाभ न ले सकेगा। किसी प्रकार कुछ मिल भी जाय तो उससे जादूगरी जैसा चमत्कार दिखा कर थोड़े दिन यश लिप्सा पूरी की जा सकती है। वास्तविक लाभ न अपना हो सकता है और न दूसरों का।

गुरु चेतना के प्रकाश में हमेशा स्वयं को परखता रहे कि कहीं कोई लालसा, वासना तो नहीं पनप रही। कहीं कोई चाहत तो नहीं उमग रही। यदि ऐसा है तो वह अपनी मनःस्थिति को कठिन तप करके बदल डाले। उन परिस्थितियों से स्वयं को दूर कर ले। क्योंकि पाप का छोटा सा अंकुर, अग्रि कीचिनगारी की तरह है- जिससे देखते- देखते समस्त तप साधना भस्म हो सकती है। इसलिए शिष्यों के लिए महान् साधकों का यही निर्देश है कि जीवन की तृष्णा एवं सुख की चाहत से सदा दूर रहें। इस सूत्र को अपनाने पर ही शिष्य संजीवनी का अगला सूत्र प्रकट होगा। जिसके द्वारा शिष्यत्व की साधना के नए वातायन खुलेंगे, नए आयाम विकसित होंगे।

पौराणिक साहित्य में ऐसे कई कथानक हैं, जिन्हें पढ़ने से पता चलता है कि बहुत ही समर्थ साधक वर्षों की निरन्तर साधना के बावजूद एकदिन अचानक अपना और अपनी साधना का सत्यानाश करा बैठे। महर्षी वाल्मीकि रामायण के आदिकाण्ड में ब्रह्मर्षी विश्वामित्र की कथा कुछ ऐसी ही है। त्रिशंकु को सदेह स्वर्ग भेजने वाले विश्वामित्र को अपनी साधना में कई बार स्खलित होना पड़ा। ऐसा केवल इसलिए हुआ, क्योंकि उन्होंने अपने ऊपर सजग दृष्टि नहीं रखी। शिष्य का पहला और अनिवार्य कर्त्तव्य है कि वह अपने गुरुदेव के आदर्श को सदा अपने सम्मुख रखे।

साधना की प्रथम परीक्षा में उत्तीर्ण होने से ही उपासना की द्वितीय कक्षा में प्रवेश मिलता है।

ओछी मनोभूमि के व्यक्ति यदि किसी प्रकार किसी तन्त्र-विधि से कुछ लाभ वरदान प्राप्त भी करलें तो भी वह अन्ततः उनके लिए विपत्ति ही सिद्ध होगी। आमाशय में अर्बुद और आंतों में व्रण से संत्रस्त रोगी यदि मिष्ठान पकवान खा भी लें उसके लिए वे बहुमूल्य और पौष्टिक होते हुए भी कुछ लाभ न पहुँचा सकेंगे। जबकि पेट से स्वस्थ सबल होने पर ज्वार, बाजरा भी पुष्टिकर सिद्ध होते हैं। रहस्यमय अनुष्ठान साधनों की मन्त्र प्रक्रिया एवं साधना विधि की गरिमा इन पंक्तियों में कम नहीं की जा रही है और न उनका महात्म्य मिथ्या बताया जा रहा है। कहा केवल यह जा रहा है कि आत्मिक प्रगति के क्षेत्र में जीवन साधना को आधार भूत मानना चाहिए और उपासना को उसकी सुसज्जा। बाल्यकाल पूरा करने के बाद ही यौवन आता है और साधना की प्रथम परीक्षा में उत्तीर्ण होने से ही उपासना की द्वितीय कक्षा में प्रवेश मिलता है।

जप आवश्यक है।

आत्मिक प्रगति के लिए उपासना का अपना महत्व है। जप आवश्यक है। आसन, प्राणायाम क्रिया प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि की छह मंजिली इमारत बनानी ही चाहिए पर उससे पहले यम नियम का ईंट, चूना नींव में गहराई तक भर के नींव पक्की कर लेनी चाहिए। मंत्र-विद्या का महात्म्य बहुत है। योग साधना की गरिमा गगनचुम्बी है। विविध-विधि उपासनायें चमत्कारी परिणाम उत्पन्न करती हैं। ऋद्धि-सिद्धियों की चर्चा काल्पनिक नहीं है, पर वह सारा आकर्षक विवरण, कथा सार आकाश कुसुम ही बना रहेगा जब तक साधना की पृष्ठ-भूमि को अनिवार्य मान कर न चला जाएगा।

अन्तर्मन में वर्षों के, जन्मों के संस्कार हैं।

अन्तर्मन में वर्षों के, जन्मों के संस्कार हैं। इनमें भलाई भी मौजूद है और बुराई भी।प्रकृति ने परत- दर इनकी बड़ी रहस्यमय व्यवस्था बना रखी है। ऊपरी तौर पर इसे जानना- पहचानना आसान नहीं है। बड़ी मुश्किल पड़ती है इस गुत्थी को सुलझाने में। जो बहुत ही ध्यान परायण है, जिनका अपने गुरु के प्रति समर्पण सच्चा और गहरा है, वही इनके जाल से बच पाते हैं। अन्यथा अचानक और औचक ही इसमें फँस कर अपना और अपनी साधना का सत्यानाश कर लेते हैं।