शक्तिशाली मनुष्य वह है, जो अकेला है।

विद्वान इब्सन का कथन है – शक्तिशाली मनुष्य वह है, जो अकेला है। कमजोर वह है, जो दूसरों का मुँह ताकता है। अकेले का अर्थ है “आत्म-निर्भर, अपने पैरों पर खड़े होने वाला”।

Wise Ibsen says, “The strongest man in the world is he who stands alone. He is weak who expects, waits for others [to help him]” (An Enemy of the People, 1882). Alone here means – self-reliant, one who is able to stand on one’||chr(39)||’s own two feet. In this context, alone does not mean an uncooperative individual. What Ibsen implies here is a person who knows his responsibilities, performs his duties, that person finds the necessary support he needs [for progress] from within. External resources easily come, drawn to him by his magnetism.

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अरुणिमा ने हार नहीं मानी और हमेशा अपना जोश बनाये रखा।

अरूणिमा को कुछ बदमाशों ने चलती ट्रेन से बाहर फेंक दिया था। अरुणिमा ने इन बदमाशों को अपनी चेन छीनने नहीं दिया था जिससे नाराज़ बदमाशों से उन्हें चलती ट्रेन से बाहर फेंक दिया। इस हादसे में बुरी तरह ज़ख़्मी अरुणिमा की जान तो बच गयी थी लेकिन उन्हें ज़िंदा रखने ले लिए डाक्टरों को उनकी बायीं टांग काटनी पड़ी। अपना एक पैर गँवा देने के बावजूद राष्ट्रीय स्टार पर वॉलीबाल खेलने वाली अरुणिमा ने हार नहीं मानी और हमेशा अपना जोश बनाये रखा।

किसी भूल अथवा बुरे काम के संबंध में पश्चाताप करना उत्तम है, लेकिन यह तारक होना चाहिए। भविष्य में ऐसा न करने का संकल्प करके सदैप उससे बचते रहने का प्रयत्न करना, ऐसे वातावरण, संग-साथ एवं साधनों से दूर रहना जो बुराई की ओर प्रवृत्त करें, इसके लिए आवश्यक होता है।

यह दुनिया बड़ी निकम्मी है।

यह दुनिया बड़ी निकम्मी है। पड़ोसी के साथ आपने जरा सी भलाई कर दी, सहायता कर दी, तो वह चाहेगा कि और ज्यादा मदद कर दे। नहीं करेंगे, तो वह नेकी करने वाले की बुराई करेगा। दुनिया का यह कायदा है कि आपने जिस किसी के साथ में जितनी नेकी की होगी, वह आपका उतना ही अधिक बैरी बनेगा। उतना ही अधिक दुश्मन बनेगा; क्योंकि जिस आदमी ने आपसे सौ रुपये पाने की इच्छा की थी और आपने उसे पन्द्रह रुपये दिये। भाई, आज तो तंगी का हाथ है, पंद्रह रुपये हमसे ले जाओ और बाकी कहीं और से काम चला लेना। पंद्रह रुपये आपने उसे दे दिये और वह आपके बट्टे खाते में गये, क्योंकि आपने पचासी रुपये दिये ही नहीं। इसलिए वह नाराज है कि पचासी रुपये भी दे सकता था, अपना घर बेचकर दे सकता था। कर्ज लेकर दे सकता था अथवा और कहीं से भी लाकर दे सकता था; लेकिन नहीं दिया। वह खून का घूँट पी करके रह जायेगा और कहेगा कि बड़ा चालाक आदमी है।

कौशल, पराक्रम, श्रम समय और वैभव यह सभी विभूतियाँ ईश्वर प्रदत्त हैं।

कौशल, पराक्रम, श्रम समय और वैभव यह सभी विभूतियाँ ईश्वर प्रदत्त हैं। इसी को समाज प्रदत्त भी कहा जा सकता है। अन्यथा एकाकी स्थिति में तो वन-मनुष्य जैसी आदिम स्थिति में भी रहा जा सकता है। जिसने दिया है उसे कृतज्ञता पूर्वक लौटा देने में ही भलमनसाहत है। इसे अपनाने में जो दुराचरण के प्रवाह प्रचलन को चीरकर अपनी शालीनता का परिचय दे पाता है वह सराहा जाता है। यह औचित्य का निर्वाह भर है। तो भी चोरों की नगरी में एक ईमानदार को भी देवता माना जाता है। आलसियों के गाँव में एक पुरुषार्थी भी मुक्त कंठ से सराहा जाता है। औसत नागरिक जैसा निर्वाह ऐसा ही औचित्य है, जिसे अपनाने के लिए नीतिमत्ता, विवेकशीलता और सद्भावना का प्रत्येक प्रतिपादन विवश करता है।

हर आदमी की अपनी मनोभूमि, रुचि, भावना और परिस्थिति होती है।

हर आदमी की अपनी मनोभूमि, रुचि, भावना और परिस्थिति होती है। यह उसी आधार पर सोचता, चाहता और करता है। हमें इतनी उदारता रखनी ही चाहिए कि दूसरों की भावनाओं का आदर न कर सकें तो कम से कम उसे सहन कर ही लें। असहिष्णुता मनुष्य का एक नैतिक दुर्गुण है। जिसमें अहंकार की गंध आती है। हर किसी को अपनी मर्जी का बनाना-चलाना चाहें तो यह एक मूर्खता भरी बात ही होगी।

हमें सफलता के लिए शक्ति भर प्रयत्न करना चाहिए

हमें सफलता के लिए शक्ति भर प्रयत्न करना चाहिए, पर असफलता के लिए जी में गुंजाइया रखनी चाहिए। प्रगति के पथ पर चलने वाले हर व्यक्ति को इस धूप-छाँव का सामना करना पड़ा है। हर कदम सफलता से ही भरा मिले ऐसी आशा केवल बाल बुद्धि वालों को शोभा देती है, विवेकशीलों को नहीं। जीवन विद्या का एक महत्त्वपूर्ण पाठ यह है कि हम न छोटी-मोटी सफलताओं से हर्षोन्मत्त हों और न असफलताओं को देखकर हिम्मत हारें।