डरो मत। श्रद्धा करो।

डरो मत। श्रद्धा करो। दुःख और आपत्ति की छाया से घिरने पर भी मत डरो। तुम अविनाशी परमात्मा के पुत्र हो। वह दिव्य अखंड ज्योति तुम्हारे अंधकार को नष्ट कर देगी। धीर बनो। तुम्हारे भीतर वह शक्ति है जो तुम्हें प्रत्येक परिस्थिति का मालिक बना देगी। उच्च विचारों का आवाहन करो। हृदय को वीर, हाथ को बलवान और इच्छा को अचल बनाओ। सत् चित् और आनंद की प्राप्ति के लिए अपनी शक्ति में श्रद्धा करो। सब में जीवन और स्फूर्ति का संचार करो। धैर्य आशा और दृढ़ निश्चय को धारण करो। जिम्मेदारियों को सिर पर लोगे, बल और साहस दिखाओगे तो निश्चय ही तुम्हें सफलता प्राप्त होगी।

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आकांक्षाओं का परिष्कार

आंतरिक और बाह्य जीवन में एक रसता – क्षमता न होने के कारण भी ऊल-जलूल आकांक्षाएँ तथा असंतोष की भावनाएँ उठा करती हैं। कई व्यक्ति आंतरिक दृष्टि से बड़े आदर्शवादी होते हैं, किन्तु संस्कारों से प्रेरित होकर कई ऐसे कार्य भी कर बैठते हैं जिससे कि आदर्शों को अपने जीवन में न उतार पाने का असंतोष और जीव विक्षोभ होता है।

दुखियों को तुम्हारी सान्त्वना भी आवश्यकता है।

दुखियों को तुम्हारी सान्त्वना भी आवश्यकता है। परेशान और पीड़ित मनुष्य दूसरों से यह आशा करता है कि उसके कष्ट में कमी करने के लिए कोई सहायक व्यक्ति उससे साधनों से न सही कम से कम वचन और भावना द्वारा उसे आश्वासन प्रदान करेंगे।

कर्म योगी का विशाल हृदय होना चाहिये।

कर्म योगी का विशाल हृदय होना चाहिये। उसमें कुटिलता, नीचता कृपणता और स्वार्थ बिल्कुल नहीं होना चाहिए, उसे लोभ, काम, क्रोध और अभिमान रहित होना चाहिए। यदि इन दोषों के चिन्ह भी दिखाई देवें तो उन्हें एक एक करके दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए, वह जो कुछ भी खाय उसमें से पहले नौकरों को देना चाहिये, यदि कोई निर्धन रोगी दूध की चाहना रखकर उसी के घर आये और घर में उसी के लिए दूध नहीं बचा हो तो उसे चाहिये कि अपने हिस्से का दूध फौरन ही उसे देदे और उससे कहे कि ‘हे नारायण! यह दूध आपके वास्ते है, कृपा कर इसे पीलो, आपकी जरूरत मुझसे ज्यादा है।’ तब ही वह सच्ची उपयोगी सेवा कर सकता है।

प्रार्थना, दया, विनय, भलमनसाहत बहुत अच्छी वस्तु है

प्रार्थना, दया, विनय, भलमनसाहत बहुत अच्छी वस्तु है, इनसे वे लोग सहज ही झुक जाते हैं जिनमें कुछ अधिक मात्रा में सत् गुण मौजूद हैं। परन्तु सब जगह उपर्युक्त तत्वों के आधार पर सफलता नहीं मिल सकती, दुष्ट स्वभाव के लोग इनकी जरा भी परवाह नहीं करते तथा विनय करने वाले को दबा हुआ समझकर और भी अधिक उद्दंडता करते हैं। ऐसी दशा में काँटे से काँटा निकालना पड़ता है, कूटनीति से काम लेना पड़ता है।

पूजा का उद्देश्य बहुत ही विशेष और महत्त्वपूर्ण है।

पूजा का उद्देश्य बहुत ही विशेष और महत्त्वपूर्ण है। पूजा के पीछे न जाने क्या क्या विधान और उद्देश्य भरे पड़े हैं। पर क्या कभी यह हमारे दिमाग में आया? कभी नहीं आया। केवल लक्ष्यविहीन कर्मकाण्ड, भावनारहित कर्मकाण्ड करते रहे, जिनके पीछे न कोई मत था न उद्देश्य। जिनके पीछे न कोई भावना थी न विचारणा। केवल क्रिया और क्रिया…। ऐसी क्रिया की मैं निन्दा करता हूँ और ऐसी क्रिया के प्रति आपके मन में अविश्वास पैदा करता हूँ, बाधा उत्पन्न करता हूँ।

प्रार्थना, दया, विनय, भलमनसाहत बहुत अच्छी वस्तु है

प्रार्थना, दया, विनय, भलमनसाहत बहुत अच्छी वस्तु है, इनसे वे लोग सहज ही झुक जाते हैं जिनमें कुछ अधिक मात्रा में सत् गुण मौजूद हैं। परन्तु सब जगह उपर्युक्त तत्वों के आधार पर सफलता नहीं मिल सकती, दुष्ट स्वभाव के लोग इनकी जरा भी परवाह नहीं करते तथा विनय करने वाले को दबा हुआ समझकर और भी अधिक उद्दंडता करते हैं। ऐसी दशा में काँटे से काँटा निकालना पड़ता है, कूटनीति से काम लेना पड़ता है।