यह हलका-फुलका धर्म कृत्य मानव-जीवन की एक साधारण-सी आवश्यकता है।

यह हलका-फुलका धर्म कृत्य मानव-जीवन की एक साधारण-सी आवश्यकता है। जिस प्रकार मुण्डन अन्न प्राशन, विद्यारम्भ, जनेऊ वानप्रस्थ आदि अन्य संस्कार होते हैं, वैसा ही विवाह भी एक साधारण-सा धर्मानुष्ठान है। उसमें संस्कार का कुछ बड़ा आयोजन रह सकता है, हर्ष उल्लास का छोटा-मोटा आयोजन भी रह सकता है, पर वह इतना खर्चीला और उलझन भरा कदापि न होना चाहिए कि आर्थिक दृष्टि से दोनों पक्षों का कचूमर ही निकल जाय। बारातियों की सर्वथा अनावश्यक भीड़ को इधर से उधर ठेले फिरने, उनके ठहराने, अनेक तरह की सुविधाएं जुटाने एवं कीमती प्रीति-भोजों का खर्चीला भार उठाने में किसका क्या लाभ होता है यह समझ में नहीं आता?

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