मानव जीवन का मूल्य न समझकर मृत्यु के दिन गिनते रहते हैं।

ऐसे कापुरुषों की भी संसार में कमी नहीं है जो मानव जीवन का मूल्य न समझकर मृत्यु के दिन गिनते रहते हैं। यह भ्रम उन्हें खाये डालता है कि वे बीमार हैं, शक्ति हीन हैं। काल्पनिक दुःख एवं चिन्ताएं हर समय उन पर सवार रहती हैं। वस्तुतः इन्हें शारीरिक रूप से कोई बीमारी नहीं होती परन्तु मानसिक निर्बलता के कारण उनकी शारीरिक तथा मानसिक दोनों ही प्रकार की शक्ति तथा सामर्थ्य पंगु बन जाती हैं। अनेक प्रकार के शारीरिक रोग इन्हें घेरे रहते हैं। जीवन के आनन्द से वंचित कर देते हैं। निर्बल एवं- रोगी शरीर व्यक्ति सुखों से सदैव वंचित ही रहता है।

Advertisements

स्वस्थ शरीर के लिए स्वस्थ मन का होना अनिवार्य है।

व्यक्ति जैसा सोचता है, वैसा ही व्यवहार करता है। विचारों का प्रभाव हमारे आचार पर अवश्यंभावी रूप से पड़ता है। अतएव मानव जीवन की सफलता के लिये स्वस्थ एवं उन्नत विचार परमावश्यक हैं। शारीरिक स्वास्थ्य तथा सौंदर्य भी स्वस्थ एवं प्रसन्न मन पर ही निर्भर है अतएव स्वस्थ शरीर के लिए स्वस्थ मन का होना अनिवार्य है।

शिष्य संजीवनी का यह सूत्र बड़ा अटपटा सा है, किन्तु इसमें बड़े ही रहस्यमय सच समाए हैं। और सच कहो तो अध्यात्म सदा से रहस्य ही है। रहस्य का मतलब ही होता है कि जिसे खोजने तो हम निकल सकते हैं, परन्तु जिस दिन हम उसे खोज लेंगे उस दिन हमारा कोई पता ही न होगा। अध्यात्म के अलावा जितनी दूसरी खोजें हैं, वे तथ्य परक हैं। तथ्य और रहस्य में एक भारी फरक है।

अपनी निष्पक्ष समीक्षा आप कर सकना यह मनुष्य का सबसे बड़ा साहस है।

अपनी निष्पक्ष समीक्षा आप कर सकना यह मनुष्य का सबसे बड़ा साहस है। अपने दोषों को ढूँढ़ना, गिनना और समझना चाहिए। साथ ही यह प्रयत्न करना चाहिए कि उन दुर्गुणों को अपने व्यक्तित्व में से अलग कर दिया जाय। निर्दोष और निर्मल व्यक्तित्व विनिर्मित किया जाय। जिस प्रकार हम दूसरों के पाप और दुर्गुणों से चिढ़ते हैं और उनकी निन्दा करते हैं वैसी ही सख्ती हमें अपने साथ भी बरतनी चाहिए और यह चेष्टा करनी चाहिए कि निन्दा करने का कोई आधार ही शेष न रहे और अप्रिय आलोचना के वास्तविक कारणों का ही उन्मूलन हो जाय।

क्षणिक निन्दा स्तुति का कोई मूल्य नहीं।

यदि गलतफहमी या द्वेषवश आलोचना की गई है तो उसे हँसकर उपेक्षा से टाल देना चाहिए। जिसमें वास्तविकता न होगी ऐसी बात अपने आप हवा में उड़ जायगी। मिथ्या निन्दा करने वाले क्षणभर के लिए ही कुछ गफलत पैदा कर सकते हैं पर कुछ ही समय में वस्तु स्थिति स्पष्ट हो जाती है और पर कीचड़ उछालने वाले को स्वतः ही उस दुष्कृत्य पर पछताना पड़ता है। मिथ्या दोषारोपण से कभी किसी का स्थायी अहित नहीं हो सकता। क्षणिक निन्दा स्तुति का कोई मूल्य नहीं। पानी की लहरों की तरह वे उठती और विलीन होती रहती हैं।

एक कामियाब इन्सान वर्तमान में जीता है

एक कामियाब इन्सान की पहचान है। एक कामियाब इन्सान वर्तमान में जीता है, उसको मनोरंजन (Enjoy) करता है और बढ़िया जिंदगी की उम्मीद में अपना वर्तमान खराब नहीं करता। अगर उससे भी बढ़िया जिंदगी मिल गई तो उसे भी वेलकम करता है उसको भी मनोरंजन (enjoy) करता है उसे भी भोगता है और उस वर्तमान को भी ख़राब नहीं करता। और अगर जिंदगी में दुबारा कोई बुरा दिन देखना पड़े तो वो भी उस वर्तमान को उतने ही ख़ुशी से, उतने ही आनंद से, उतने ही मज़े से, भोगता है मनोरंजन करता है और उसी में आनंद लेता है।”

यह फूल की तरह खिलना और विकसित होना है।

यह फूल की तरह खिलना और विकसित होना है। फूल को तो अपने खिलने का भान भी नहीं होता। सच यही है कि कली कब फूल बन जाती है पता ही नहीं चलता। हाँ यह जरूर है कि वह सदा ही अपनी आत्मा को वायु के समक्ष-प्रकाश के समक्ष खोलने को उत्सुक रहती है। कली समॢपत होती है, प्रकाश के प्रति, हवा के प्रति, समूची प्रकृति के प्रति। इसके अलावा वह कोई और चेष्टा नहीं करती। उसमें तो बस इतनी आतुरता होती है, सिर्फ इतनी प्यास होती है कि उसके भीतर जो सुगन्ध है, वह हवाओं में लुट जाये। इस क्रम में जो सबसे बेशकीमती बात है, वह यह है कि आतुरता के क्षणों में भी कली कोई चेष्टा नहीं करती, बस प्रतीक्षा करती रहती है। निरन्तर एवं अनवरत प्रतीक्षा। उसकी प्रतीक्षा होती है कि सूरज उगेगा, हवायें आयेंगी और फिर वह फूल बन जायेगी। फूल बनकर वह सारी सुगन्ध को हवाओं में लुटा देगी।