माँ दुर्गा की आठवीं शक्ति को महागौरी के नाम से जाना जाता है।

माँ दुर्गा की आठवीं शक्ति को महागौरी के नाम से जाना जाता है। दुर्गापूजा के आठवें दिन महागौरी की उपासना का विधान है। इन्होनें भगवान शिव के वरण के लिए कठोर संकल्प लिया था। इस कठोर तपस्या के कारण इनका शरीर एकदम काला पड़ गया । इनकी तपस्या से प्रसन्न और संतुष्ट होकर जब भगवान ने इनके शरीर को गंगाजी के पवित्र जल से मलकर धोया तब वह विद्युत प्रभा के समान अत्यंत कांतिमान गौर हो उठा। तभी से इनका नाम महागौरी पड़ा। माँ महागौरी का वर्ण पूर्णतः गौर है। इस गौरता की उपमा शंख, चन्द्र और कुंद के फूल से दी गई है। इनकी मुद्रा अत्यंत शांत है। जिनके स्मरण मात्र से भक्तों को अपार खुशी मिलती है, इसलिए इनके भक्त अष्टमी के दिन कन्याओं का पूजन और सम्मान करते हुये महागौरी की कृपा प्राप्त करते हैं। यह धन-वैभव और सुख शांति की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती है।

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माँ दुर्गा की सातवीं शक्ति को कालरात्रि के नाम से जाना जाता है।

माँ दुर्गा की सातवीं शक्ति को कालरात्रि के नाम से जाना जाता है। दुर्गापूजा के सातवें दिन माँ कालरात्रि की उपासना का विधान है। इस दिन साधक का मन सहस्रार चक्र में स्थित रहता है। उसके लिए ब्रह्मांड की समस्त सिद्धियों का द्वार खुलने लगता है। उसे अक्षय पुण्य लोकों की प्राप्ति होती है। माँ कालरात्रि दुष्टों का विनाश करने वाली देवी हैं। देवी कालरात्रि गदर्भ पर सवार है। माँ का वर्ण काला होने पर भी कांतिमय और अदभूत दिखाई देता है। देवी कालरात्रि का यह विचित्र रूप भक्तों के लिए अत्यंत शुभ है इसलिए देवी को शुभंकारी भी कहा गया है। इनसे भक्तों को किसी प्रकार भी भयभीत अथवा आतंकित होने की आवश्यकता नहीं है।

माँ कात्यायनी

नवरात्र के छठवें दिन माँ कात्यायनी की पूजा की जाती है। कात्यायन ऋषि के यहाँ जन्म लेने के कारण माता के इस स्वरूप का नाम कात्यायनी पड़ा । अगर माँ कात्यायनी की पूजा सच्चे मन से की जाए तो भक्त के सभी रोग दोष दूर होते है। इस दिन साधक का मन आज्ञा चक्र में स्थित होता है। योगसाधना में आज्ञा चक्र का विशेष महत्व है। माँ कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत चमिका और भव्य है। माता का भक्त इस लोक में स्थित रहकर भी अलौकिक तेज और प्रभाव से युक्त हो जाता है।

नवरात्र के पंचवे दिन माँ स्कन्दमाता की पूजा की जाती है।

नवरात्र के पंचवे दिन माँ स्कन्दमाता की पूजा की जाती है। आदिशक्ति का ये ममतामयी रूप है। गोद में स्कन्द यानि कार्तिकेय स्वामी को लेकर विराजित माता का यह स्वरूप जीवन में प्रेम, स्नेह, संवेदना को बनाए रखने की प्रेरणा देता है। भगवान स्कन्द ‘कुमार कार्तिकेय’ नाम से भी जाने जाते है। ये प्रसिद्ध देवासुर संग्राम में देवताओं के सेनापति बने थे। पुराणों में स्कन्द को कुमार और शक्ति कहकर इनकी महिमा का वर्णन किता गया है। इन्हीं भगवान स्कन्द की माता होने के कारण माँ दुर्गा के इस स्वरूप को स्कन्दमाता के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि स्कन्दमाता की पूजा से सभी मनोरथ पूरे होते हैं। इस दिन साधक का मन विशुद्ध चक्र में अवस्थित होता है। माँ स्कन्दमाता कि उपासना से भक्ति की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाती है साधक को शांति और सुख का अनुभव होने लगता है । स्कन्दमाता की उपासना से बालरूप स्कन्द भगवान की उपासना अपने आप हो जाती है। सूर्यमण्डल की आधिष्ठात्री देवी होने के कारण स्कन्दमाता की पूजा करने वाला व्यक्ति अलौकिक तेज एवं कांति से सम्पन्न हो जाता है।

माँ दुर्गा की चौथी शक्ति का नाम कूष्मान्डा है।

माँ दुर्गा की चौथी शक्ति का नाम कूष्मान्डा है। अपनी मंद हंसी से ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्मान्डा कहा जाता है। यह सृष्टि की आध शक्ति है। माँ कूष्मान्डा के स्वरूप को ध्यान में रखकर आराधना करने से समस्त रोग और शोक नष्ट हो जाते हैं।

माँ दुर्गा की तीसरी शक्ति माता चन्द्रघंटा की पुजा अर्चना की जाती है।

नवरात्र के तीसरे दिन माँ दुर्गा की तीसरी शक्ति माता चन्द्रघंटा की पुजा अर्चना की जाती है। माँ चन्द्रघंटा की उपासना से भक्तों को भौतिक, आत्मिक, आध्यात्मिक सुख और शांति मिलती है। माँ की उपासना से घर-परिवार से नकारात्मक ऊर्जा यानि कलह और अशांति दूर होती है। माँ चन्द्रघंटा का स्वरूप अति भव्य है। माँ सिंह यही शेर पर प्रसन्न मुद्रा में विराजमान होती है। दिव्य रुपधारी माता चन्द्रघंटा की दस भुजाएँ हैं। माता का स्मरण करते हुये साधकजन अपना मन मणिपुर चक्र में स्थित करते हैं। माँ चन्द्रघंटा नाद की देवी है। इनकी कृपा से साधक को अलौकिक दिव्य दर्शन एवं दृष्टि प्राप्त होती है। साधक के समस्त पाप-बंधन छुट जाते हैं।

माता ब्रह्मचारिणी दुर्गा का दूसरा रूप है।

माता ब्रह्मचारिणी दुर्गा का दूसरा रूप है। इस स्वरूप की उपासना से ताप, त्याग, वैराग्य सदाचार तथा विवेक की वृद्धि होती है। वह समस्त लोक के चर और अचर जगत की विद्याओं की ज्ञाता हैं। माता ब्रहंचारिणी की पुजा और साधना करने से कुंडलिनी शक्ति जागृत होती है। ऐसा भक्त इसलिए करते हैं ताकि उनका जीवन सफल हो सके और अपने सामने आने वाली किसी भी प्रकार की बाधा का सामना आसानी से कर सकें।