प्रेम नष्ट नहीं होता और न उससे कभी दुख की उत्पत्ति होती है।

सच्चा प्रेम करने वाले, इस प्रकार के दो मनुष्य एक दूसरे से चाहे हजारों मील के अन्तर पर हों, पर उनके प्रेम में फर्क नहीं पड़ता। वह नष्ट नहीं होता और न उससे कभी दुख की उत्पत्ति होती है।

Advertisements

बदला पाने की इच्छा रहित जो भलाई की गई है, वह समुद्र की तरह महान है।

बदला पाने की इच्छा रहित जो भलाई की गई है, वह समुद्र की तरह महान है। कोई मनुष्य किसी आवश्यकता से व्याकुल हो रहा है, उस समय उसकी मदद करना कितना महत्वपूर्ण है, इसे उस व्याकुल मनुष्य का हृदय ही जानता है। जरूरतमंदों को एक राई के बराबर मदद देना उससे बढ़ कर है कि बिना जरूरत वाले के पल्ले में एक पहाड़ बाँध दिया जावे। किसी को कष्ट में से उबारना, जन्म जन्मान्तरों के लिए अपना पथनिर्माण करना है।

मनुष्य का जीवन केवल उन्हीं अनुभवों, विचार, मनोभावनाओं संकल्पों का परिणाम नहीं जो स्मृति के पटल पर है। प्रत्युत गुप्त मन में छिपे हुए अनेक संस्कार और अनुभव जो हमें खुले तौर पर स्मरण भी नहीं हैं, वे भी हमारे व्यक्तित्व को बनाते हैं।

संपदा ही आज सामाजिक मूलयों का प्रतीक और प्रतिष्ठा का आधार बन बैठी है।

युवाओं का एक वर्ग ऐसा भी है, जो आधुनिकता के नाम पर पश्चिमी संस्कृति और सभ्यता से इतना तदाकार हो चुका है कि उसके सामने अपनी संस्कृति महज एक संग्रहालय कि वस्तु है, जिसे देखा तो जा सकता है, अपनाया नहीं जा सकता, क्योंकि इनके लिए एकमात्र लक्ष्य है- किसी भी तरीके से धन अर्जन । संपदा ही आज सामाजिक मूलयों का प्रतीक और प्रतिष्ठा का आधार बन बैठी है।

कन्या और पुत्र दोनों ही माता की प्राणप्रिय संतान हैं।

कन्या और पुत्र दोनों ही माता की प्राणप्रिय संतान हैं। ईश्वर को नर और नारी दोनों दुलारे हैं। कोई भी निष्पक्ष और न्यायशील माता-पिता अपने बालकों में इसलिए भेदभाव नहीं करते कि वे कन्या हैं या पुत्र हैं। ईश्वर ने धार्मिक कर्तव्यों एवं आत्मकल्याण के साधनों की नर और नारी दोनों को ही सुविधा दी है। यह समता, न्याय और निष्पक्षता की दृष्टि से उचित है, तर्क और प्रमाणों से सिद्ध है। इस सीधे-सीधे तथ्य में कोई विघ्न डालना असंगत ही होगा।

मानव जाति के लिए जो संदेश दिया गया है, उसका किसी धर्म,संप्रदाय,जाति,वर्ग से लेना–देना नहीं है, वरन वह सबके लिए समान है और शाश्वत है। इसके अतिरिक्त इसमें कई विद्दाओं का भी उल्लेख है,जिनमें चार प्रमुख हैं-अभय विद्दा, साम्य विद्दा, ईश्वर विद्दा और ब्रहा विद्दा। इनमें अभय विद्दा मृत्यु के भय को दूर करती है।

कन्या और पुत्र दोनों ही माता की प्राणप्रिय संतान हैं।

कन्या और पुत्र दोनों ही माता की प्राणप्रिय संतान हैं। ईश्वर को नर और नारी दोनों दुलारे हैं। कोई भी निष्पक्ष और न्यायशील माता-पिता अपने बालकों में इसलिए भेदभाव नहीं करते कि वे कन्या हैं या पुत्र हैं। ईश्वर ने धार्मिक कर्तव्यों एवं आत्मकल्याण के साधनों की नर और नारी दोनों को ही सुविधा दी है। यह समता, न्याय और निष्पक्षता की दृष्टि से उचित है, तर्क और प्रमाणों से सिद्ध है। इस सीधे-सीधे तथ्य में कोई विघ्न डालना असंगत ही होगा।