‘आत्मा’ रूपी ‘सबस्टेशन’

बिजली घर की बिजली, हमारे घर के बल्बों में उछल कर नहीं चली आती। इसके लिए सम्बन्ध जोड़ने वाले मध्यवर्ती तार बिछाने पड़ते हैं। ब्रह्माण्डीय चेतना से सम्बन्ध जोड़ने के लिये आदान-प्रदान के जो सूत्र जोड़े जाते हैं उसके लिये ‘आत्मा’ रूपी ‘सबस्टेशन’ को बड़े ‘पावर हाउस’ से जुड़ सकने योग्य भी बनाया जाता है। इससे कम में आत्मिक उपलब्धियों की सिद्धि सम्भव नहीं।

आत्म साधना का अर्थ है

आत्म साधना का अर्थ है- व्यक्ति चेतना के स्तर को इतना परिष्कृत करना कि उस पर ब्रह्म चेतना के अनुग्रह का अवतरण सहज सम्भव हो सके। आत्म-सत्ता का चुम्बकत्व इस अनुदान को सहज आकर्षित कर सकता है, पहले इसकी महत्ता को जानें तो सही। सूक्ष्म जगत की विभूतियों को पकड़ने हेतु जिस सामर्थ्य की आवश्यकता होती है, वह अपने आपको जाने बिना सम्भव नहीं।

गीता में भगवान ने कहा है

गीता में भगवान ने कहा है-यदि तू अज्ञान और मोह में पड़कर कर्म करने के अधिकार को कुचलेगा, तो याद रख कि स्वभाव से उत्पन्न कर्म के अधीन होकर तुझे सब कुछ करना पड़ेगा। ईश्वर सब प्राणियों के हृदय प्रदेश में बसा हुआ है और जो मनुष्य अपने स्वभाव तथा अधिकार के विपरीत कर्म करते हैं, उनको यह माया का डंडा लगातार इस प्रकार घुमा देता है, जैसे कुम्हार चाक पर पऱ चढ़ाकर एक मिट्टी के बर्तन को घुमाता है।

कर्म करना मनुष्य का अधिकार है

कर्म करना मनुष्य का अधिकार है, परन्तु इसके विपरीत कर्म को छोड़ देने में वह स्वतंत्र नहीं है। किसी प्रकार भी कोई प्राणी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। यह हो सकता है कि जो कर्म उसे नहीं करना चाहिए, उसका वह आचरण करने लगे। ऐसी अवस्था में स्वभाव उसे जबरदस्ती अपनी ओर खींचेगा और उसे लाचार होकर यन्त्र की भाँति कर्म करना पड़ेगा।

कर्म की स्वतंत्रता

समस्त योनियों में से केवल मनुष्य योनि ही ऐसी योनि है, जिसमें मनुष्य कर्म करने के लिए पूर्ण स्वतंत्र है। ईश्वर की ओर से मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि इसलिए प्रदान किए गए हैं कि वह प्रत्येक काम को मानवता की कसौटी पर कसे और बुद्धि से तोल कर, मन से मनन करके, इंद्रियों द्वारा पूरा करे। मनुष्य का यह अधिकार जन्मसिद्ध है। यदि वह अपने इस अधिकार का सदुपयोग नहीं करता, तो वह केवल अपना कुछ खोता ही नहीं है, बल्कि ईश्वरीय आज्ञा की अवहेलना करने के कारण पाप का भागी बनता है।

प्रभु का विश्वस्त सेवक दुःख अपने साथ न रहे, तो अन्तरात्मा पर कषाय-कल्मष की परतें चढ़ती जाती हैं। ‘अहं’ का विषधर समूची चेतना को ही डस लेता है। आत्मा के प्रकाश के अभाव में प्रवृत्तियों एवं कृत्यों में पाप और अनाचार की बाढ़ आ जाती है। सत् और असत् का विवेक जाता रहता है। जीव सघन अँधेरे और घने कुहासे में घिर जाता है। इन अँधेरों में मूर्च्छना में वह संसार के छद्म जाल को अपना समझने लगता है और प्रभु के शाश्वत मृदुल प्रेम को पराया। और तब प्रभु अपने प्रिय को उबारने के लिए-उसे अपनाने के लिए अपने सबसे भरासेमन्द सेवक दुःख को उसके पास भेजते हैं।

वर्षा, आँधी, तूफान, हिमपात, मौसम आदि की पूर्व जानकारी लक्षणों को देखते हुए अनुमान की पकड़ में आ जाती है। इसी प्रकार अदृश्य जगत में चल रही सचेतन हलचलों को देखते हुए भविष्य की सम्भावनाओं का, भूतकाल की घटनाओं का और वर्तमान की परिस्थितियों का पूर्वाभास प्राप्त किया जा सकता है। सामान्यतः मनुष्य की समझ अपने क्रिया-कलाप का निर्धारण करने में ही काम आती है। उसे परिस्थितियों की पृष्ठभूमि तथा सम्भावना के सम्बन्ध में कोई बात अलग से जानकारी नहीं होती। सूक्ष्म जगत से संपर्क साध सकना यदि सम्भव हो सके तो अन्धेरी गलियों में भटकते रहने की अपेक्षा सुनिश्चित प्रकाश का अवलम्बन मिल सकता है।

प्रभु जब किसी को अपना मानते हैं, उसे गहराइयों से प्यार करते हैं

प्रभु जब किसी को अपना मानते हैं, उसे गहराइयों से प्यार करते हैं, तो उसे अपना सबसे भरोसेमन्द सेवक प्रदान करते हैं और उससे कहते हैं कि तुम हमेशा मेरे प्रिय के साथ रहो, उसका दामन कभी न छोड़ो। कहीं ऐसा न हो कि हमारा प्रिय भक्त अकेला रहकर संसार की चमक-दमक से भ्रमित हो जाए, ओछे आकर्षणों की भूल-भुलैयों में भटक जाए अथवा फिर सुख-भोगों की झाड़ियों में अटक जाए। प्रभु के इस विश्वस्त सेवक का नाम है-दुःख। सचमुच वह ईश्वरभक्त के साथ-साथ छाया की तरह चिपका रहता है।

साधना के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध किया जाना चाहिए।

साधना के लिए जिस प्रकार आहार-विहार में अधिकाधिक सात्विकता का समावेश रखने की आवश्यकता है उसी प्रकार उसके लिए अनुकूल वातावरण भी उपलब्ध किया जाना चाहिए। वातावरण से तात्पर्य है उद्देश्य के अनुरूप स्थान एवं संपर्क सान्निध्य। इन दोनों का सुयोग न बन पड़ने पर विक्षेपों के घटाटोप जमते रहते हैं और प्रयत्न को अग्रगामी न होने देने वाले अवरोध पग-पग पर आ खड़े होते हैं। इसलिए शान्तिदायक स्थान और उसी तरह के लोगों का सामीप्य भी आवश्यक हो जाता है।

​समय संसार की सबसे मूल्यवान् सम्पदा है।

समय संसार की सबसे मूल्यवान् सम्पदा है। विद्वानों एवं महापुरुषों ने वक्त को सारी विभूतियों का कारणभूत हेतु माना है। समय का सदुपयोग करने वाले व्यक्ति कभी भी निर्धन अथवा दुःखी नहीं रह सकते। कहने को कहा जा सकता है कि श्रम से ही सम्पत्ति की उपलब्धि होती है किन्तु श्रम का अर्थ भी वक्त का सदुपयोग ही है। असमय का श्रम पारिश्रमिक से अधिक थकान लाया करता है।