​मनुष्य का जन्म तो सरल है 

मनुष्य का जन्म तो सरल है पर मनुष्यता उसे कठिन प्रयत्न से प्राप्त करनी होती है।  जो अपने को मनुष्य बनाने में सफल हो जाता है उसे हर काम में सफलता मिल सकती है। 

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​संस्कारों की पूर्व सूत्रधार माता ही है

संस्कारों की पूर्व सूत्रधार माता ही है। वह जिस तरह के संकल्प और विचार बच्चे में  पैदा करती है, वैसा ही उसमें ग्रहनशीलता और आविर्भाव हो जाता है और बाद में उसी तरह के तत्व वह संसार में ढूँढकर अपने संस्कारजन्य गुणों का अभिवर्द्धन करता है। संस्कारवान माताएँ बच्चों के चरित्र की नींव बाल्यवस्था में डालती हैं। 

​हमें स्वयं को अपनी गलतियों पर दंडित करने का स्वभाव विकसित करना चाहिए।

हमें स्वयं को अपनी गलतियों पर दंडित करने का स्वभाव विकसित करना चाहिए। इसी प्रकार हम स्वयं ही न्यायाधीश के समान अपनी गलती की गंभीरता को देखते हुए दंड निर्धारित कर लें और कठोरता से उसका पालन करें। इसे प्रायश्चित भी कहते हैं। इससे एक ओर तो परिवार व समाज में हमारा मान बढ़ता है वहीं दूसरी ओर आत्मसंतोष होता है, अपराधबोध से मुक्ति मिलती है और परमात्मा के दण्ड से छुटकारा भी होता है।

​खोई दौलत फिर कमाई जा सकती है।

खोई दौलत फिर कमाई जा सकती है। भूली हुई विद्या फिर याद की जा सकती है। खोया स्वास्थ्य चिकित्सा द्वारा लौटाया जा सकता है पर खोया हुआ समय किसी प्रकार नहीं लौट सकता, उसके लिए केवल पश्चाताप ही शेष रह जाता है। जिस प्रकार धन के बदले में अभिष्ठित वस्तुएँ खरीदी जा सकती हैं, उसी प्रकार समय के बदले में भी विद्या, बुद्धि, लक्ष्मी कीर्ति आरोग्य, सुख -शांति, मुक्ति आदि जो भी वस्तु रुचिकर हो खरीदी जा सकती है।

हम सबमें साहस का एक ऐसा दरिया बहता है, जिसके पानी को हमने अब तक छूया ही नहीं है। यही वजह हैं की कभी-कभी खुद पर ही विश्वास नहीं होता है कि यह कार्य हमने ही किया हैं। हमारी सूझबूझ हमें हैरत में डाल देती हैं। अपनी मजबूती की जितनी थाह हमें पता है सच में वह उससे कहीं गहरी हैं।

​मनुष्य को भगवान ने ऐसा विकसित मनःसंस्थान दिया है, जिसके सहारे वह बहुत कुछ सोच सकता है

मनुष्य को भगवान ने ऐसा विकसित मनःसंस्थान दिया है, जिसके सहारे वह बहुत कुछ सोच सकता है | भूतकालीन घटनाओं से अनुभव सम्पादित करता है, वर्तमान की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भरन्सक प्रयत्न करता है | भविष्य को अधिक सुखद-समुन्नत बनाने के लिए भी प्रयत्न करता है, निति और सुविधाएँ सँजोने, प्रगति के आधार खड़े करने के लिए जो कुछ बन पड़ता है सो करता है | इन्हीं मानसिक विशेषताओं के कारण उसमें संकल्पशक्ति, इच्छाशक्ति, साहसिकता, तत्परता आदि विशेषताओं का अभिवर्धन हुआ है, वह अन्य प्राणियों की तुलना में अधिक सुविकसित बन सका है |

आध्यात्मिक जीवन बहुत ही वैज्ञानिक एंव सुव्यवस्थित जीवन है

कुछ लोग अध्यात्म को एक चमत्कारिक,अलौकिक व दिव्य जीवन समझते रहे है, तो कुछ लोग अध्यात्म को एक असामान्य घटना मानते है। वास्तव में आध्यात्मिक जीवन बहुत ही वैज्ञानिक एंव सुव्यवस्थित जीवन है, जिसे कोई भी सामान्य व्यक्ति अपना कर अपने जीवन को आध्यात्मिक बना सकता है।