धनदान तो एक प्रतीक मात्र है।

धनदान तो एक प्रतीक मात्र है। उसका तो दुरुपयोग भी हो सकता है, प्रभाव विपरीत भी पड़ सकता है। वास्तविक दान प्रतिभा का है, धम साधन उसी से उपजते हैं। प्रतिभादान-समयदान से ही संभव है। यह ईश्वर प्रदत्त सम्पदा सबके पास समान रूप से विद्यमान है।

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इस नश्वर जगत में भी सभी चीजे नाशवान है

इस नश्वर जगत में भी सभी चीजे नाशवान है जैसे सौंदर्ये और यौवन का नाश भी होता है। कभी- न- कभी नाम, कीर्ति भी समाप्त हो सकती है। ऊंचे–ऊंचे पर्वत भी एक दिन चूर –चूर होते हैं। घमंड का भी नाश अवश्यंभावी है, परंतु इस नश्वर जगत में केवल एक सत्य ही चिरस्थायी है। इसका कभी भी नाश नहीं होता है।

जीवन की अपनी उपयोगिता है

जीवन की अपनी उपयोगिता है और मरण की भी अपनी। दोनों का संतुलन मिलाकर चला जाए तो हर्ष एंव उद्देग के उन्मत–विक्षिप्त बना देने वाले आवेशों से काफी कुछ बचा जा सकता है। रात का रात के ढंग से और दिन का दिन के ढंग से प्रयोग करके हम सुखी रह सकते हैं और दोनों स्थितियों के साथ जुड़े हुए लाभों का आनंद ले सकते हैं।

लेखनी तो मनुष्य का अपना आविष्कार है।

लेखनी तो मनुष्य का अपना आविष्कार है। मस्तिष्क पर सीधा असर वाणी का ही होता है, क्योंकि उसके साथ वक्ता की प्राणशक्ति सम्बद्ध होती है तथा वाणी की अपूर्णता भाव मुद्रा से भी पूर्ण हो जाती है। अतएव उसकी शक्ति लेखनी की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी मानी जाती है।

कार्यकुशलता, कार्य को सही से करने व अच्छे परिणाम देने में हमारी मदद करती है

कार्यकुशलता, कार्य को सही से करने व अच्छे परिणाम देने में हमारी मदद करती है और हमारे लिए उन्नति के द्वार भी खोलती है। इसलिए चाहे जो भी कार्य किया जाए, उसे पूरे मन से किया जाए, पूरी कुशलता के साथ किया जाए, तभी हमें उस काम का यथोचित लाभ मिलता है और हमारा मन संतुष्ट होता है।

भगवान करुणा सागर हैं।

भगवान करुणा सागर हैं। उन्हें हर स्तर के व्यक्ति पसंद हैं, जो उन तक किसी न किसी माध्यम से पहुँचने का प्रयास करते हैं। चाहे वह भजन या प्रभु स्मरण मतलब के लिए ही क्यों न हो। उन्हें पुण्यवान भी कहा है। यह भगवान का प्रेमी है, इसका अंतःकरण अभी मजबूत नहीं हुआ। दुःखों में विचलित हो जाता है। आकुल-व्याकुल हो जाता है।

संसाररूपी इस जीवन-समर में,

संसाररूपी इस जीवन-समर में, जो स्वंय को आनंदमय बनाए रखता है, दूसरों को भी हँसाता रहता है ,वह ईश्वर का प्रकाश ही फैलता है। यहाँ जो कुछ भी है, आनंदित होने तथा दूसरों को प्रसन्नता देने के लिए ही उपजाया गया है। जो कुछ भी बुरा व अशुभ है, वह मनुष्य को प्रखर बनाने के लिए मौजूद है। जो प्रतिकूलताओं से डरकर रो पड़ता है, कदम पीछे हटाने लगता है, उसकी आध्यात्मिकता पर कौन विश्वास करेगा।