आत्मोन्नति भी एक पुरुषार्थ है।

यह एक रहस्यमय तथ्य है कि मंद बुद्धि, मूर्ख, डरपोक, कमजोर तबियत के ‘सीधे’ कहलाने वालों की अपेक्षा वे लोग अधिक जल्दी आत्मोन्नति कर सकते हैं जो अब तक सक्रिय, जागरुक, चैतन्य, पराक्रमी, पुरुषार्थी एवं बदमाश रहे हैं। कारण यह है कि मंद चेतना वालों में शक्ति का स्त्रोत बहुत ही न्यून होता है वे पूरे रचनाकारी और भक्त रहें तो भी मंद शक्ति के कारण उनकी प्रगति अत्यंत मंदाग्नि से होती है। पर जो लोग शक्तिशाली हैं, जिनके अन्दर चैतन्यता और पराक्रम का निर्झर तूफानी गति से प्रवाहित होता है वे जब भी, जिस दिशा में भी लगेंगे उधर ही सफलता का ढेर लगा देंगे। अब तक जिन्होंने बदमाशी में अपना झंडा बुलन्द रखा है वे निश्चय ही शक्ति सम्पन्न तो हैं पर उनकी शक्ति कुमार्ग गामी रही है यदि वही शक्ति सत्पथ पर लग जाय तो उस दिशा में भी आश्चर्य जनक सफलता उपस्थित कर सकती है। गधा दस वर्ष में जितना बोझा ढोता है, हाथी उतना बोझा एक दिन में ढो सकता है। आत्मोन्नति भी एक पुरुषार्थ है। इस मंजिल पर भी वे ही लोग शीघ्र पहुँच सकते हैं जो पुरुषार्थी हैं, जिनके स्नायुओं में बल और मन में अदम्य साहस तथा उत्साह है।

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‘बुरे’ भी ‘भले’ बन सकते हैं।

कोई मनुष्य अपने पिछले जीवन का अधिकाँश भाग कुमार्ग में व्यतीत कर चुका है या बहुत सा समय निरर्थक बिता चुका है तो इसके लिए केवल दुख मानने पछताने या निराशा होने से कुछ प्रयोजन सिद्ध न होगा। जीवन का जो भाग शेष रहा है वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। राजा परीक्षित को मृत्यु से पूर्व एक सप्ताह आत्म कल्याण को मिला था, उस ने इस छोटे समय का सदुपयोग किया और अभीष्ट लाभ प्राप्त कर लिया। बाल्मीकि के जीवन का एक बड़ा भाग, लूट, हत्या, डकैती आदि करने में व्यतीत हुआ था वे संभले तो वर्तमान जीवन में ही महान ऋषि हो गये। गणिका जीवन भर वेश्या वृत्ति करती रही, सदन कसाई, अजामिल, आदि ने कौन से दुष्कर्म नहीं किये थे। सूरदास को अपनी जन्म भर की व्यभिचारी आदतों से छुटकारा मिलते न देखकर अन्त में आंखें फोड़ लेनी पड़ी थी, तुलसीदास का कामातुर होकर रातों रात ससुराल पहुँचना और परनाले में लटका हुआ साँप पकड़ कर स्त्री के पास जा पहुँचना प्रसिद्ध है। इस प्रकार के असंख्यों व्यक्ति अपने जीवन का अधिकाँश भाग बुरे कार्यों में व्यतीत करने के उपरान्त सत्पथ गामी हुए हैं और थोड़े से ही समय में योगी और महात्माओं को प्राप्त होने वाली सद्गति के अधिकारी हुए हैं।

धर्म की प्रथम घोषणा यही है कि आत्मा एक है।

धर्म की प्रथम घोषणा यही है कि आत्मा एक है। ‘एक’ अनेक नहीं हो सकता। यह कैसे सम्भव है? एक अनेक के समान प्रतीत अवश्य होता है। जैसे रेगिस्तान में जल का आभास किसी स्थिति विशेष में मनुष्य, आकाश में नीलिमा, सीप की चाँदी तथा रस्सी का साँप। इसे ‘अध्यात्म’ कहते हैं। इस अध्यात्म को ब्रह्म- चिन्तन अथवा ज्ञान-अध्यात्म द्वारा नष्ट कर दे और ब्रह्मशक्ति द्वारा चमत्कृत हो। ब्रह्म अवस्था को पुनः प्राप्त करने की चेष्टा कर। अपने सत्-चित्त आनन्द स्वरूप में रमण कर।

विदुर का भोजन और श्रीकृष्ण

विदुर जी ने जब देखा कि धृतराष्ट्र और दुर्योधन अनीति करना नहीं छोड़ते, तो सोचा कि इनका सान्निध्य और इनका अन्न मेरी वृत्तियों को भी प्रभावित करेगा। इसलिए वे नगर के बाहर वन में कुटी बनाकर पली सुलभा सहित रहने लगे। जंगल से भाजी तोड़ लेते, उबालकर खा लेते तथा सत्यकार्यो में, प्रभु स्मरण में समय लगाते।

अपने विचारों पर पैनी दृष्टि

अपने विचारों पर पैनी दृष्टि रखें,क्योंकि ये एक दिन शब्द रूप में मुखरित होंगे । अपने शब्दों पर इससे भी पैनी दृष्टि रखें,क्योकि ये ही एक दिन कर्म रूप में प्रस्फुटित होंगे । अपने कर्मों पर उससे भी पैनी दृष्टि रखें,क्योकि ये ही आदतों में परिणत होते है । अपने आदतों पर और भी पैनी दृष्टि रखे,क्योकि आदतें ही चित्त में संस्कारों के रूप में जड़ जमा कर बैठ जायेंगी । इन्हीं संस्कारों से चरित्र का निर्माण होकर रहेगा ।

समय : एक बार गँवाने के कभी नहीं पाया जा सकता

संसार में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं, जिसकी प्राप्ति मनुष्य के लिए असंभव हो। प्रयत्न एवं पुरुषार्थ से सभी कुछ पाया जा सकता है। लेकिन एक ऐसी चीज है, जिसे एक बार गँवाने के कभी नहीं पाया जा सकता और वह है समय।

अपने को असमर्थ अशक्त,एवं असहाय मत समझिए,

अपने को असमर्थ अशक्त,एवं असहाय मत समझिए, ऐसे विचारों का परित्याग कर दीजिए कि साधनों के अभाव में हम किस प्रकार आगे बढ़ने के लिए व्यग्र हो रही है, उन्नति करने कि तीव्र इच्छाएँ बलवती हो रही हैं, तो विश्वास रखिए साधन आपको प्राप्त होकर रहेंगे ईश्वर उन लोगों कि पीठ पर अपना वरद हस्त रखता है, जो हिम्मत के साथ आगे कदम बढ़ाते है। आगे बढ़िए, आत्मउन्नति कीजिए। ऊँचे पद पर चढ़ने का उद्योग कीजिए, पुण्य संचय करिए।