विशवास करो की तुम महान हो 

​ विशवास करो की तुम महान हो –विशवास करो की तुम महान कार्य के लिए आए हो| तुम्हारे भीतर महान आत्मा का निवास है| विशवास करो की तुम अकेले नहीं हो| तुम्हारे साथ सर्वशक्तिमान सरबयापक परमात्मा है| आत्मसमर्पण का अर्थ यह नहीं है की तुम आत्म विसवास खो बैठो| जब तुमने परमात्मा को आत्म समर्पण किया है,तब तुममे पूर्ण  आत्मविश्वास जाग्रत होना चाहिए| उस दशा मे तुम महान बन गए हो,तुम्हें भय नहीं रहा,ऐसा सोचो

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​अध्यात्म विद्या के शक्तितंत्र को धारण करने के लिए परशुराम, भगीरथ जैसी आत्माओं की जरूरत पड़ती है। 

​अध्यात्म विद्या के शक्तितंत्र को धारण करने के लिए परशुराम, भगीरथ जैसी आत्माओं की जरूरत पड़ती है। घटिया लोग कुण्डलिनी जागरण से लेकर सिद्धि – सामर्थ्यों की उपलब्धि के स्वपन भर देखते है। उन्हें धारण करने के लिए शंकर जैसी जटाएँ चाहिए, सो कोई अपनी सर्वतोमुखी पात्रता विकसित करता नहीं, मात्र तंत्र-मंत्र के छिटपुट कर्मकांडों से लंबे-चौड़े स्वप्न देखते और विफल मनोरथ, असफल बने रहते हैं। 

भूलों को सुधारने से ही मनुष्य अपने जीवन में कुछ सीख पता है।

संघर्ष, प्रयास व उस दौरान होने वाली भूलों को सुधारने से ही मनुष्य अपने जीवन में कुछ सीख पता है। सीखने के लिए उसे इन चरणों से होकर गुजरना ही पड़ता है। चाहे व्यक्ति स्वेच्छा से गुजरे, चाहे अनिच्छा से, चाहे खुशी से करे, चाहे दुखी मन से, लेकिन उसे करना तो अवश्य पड़ता है। इसी प्रक्रिया से उसकी क्षमताएँ निखरती है और वह सफल होने के योग्य हो पाता है।

संघर्ष का दूसरा नाम ही जीवन है।

यह जीवन ही संघर्ष है। जो इस जीवन में जितना संघर्ष करने की कोशिश करता है, उतना ही विकास करता है और प्रकृति भी उसके सामने तदनुरूप कठिन परिस्थितियाँ व चुनौती प्रस्तुत करने के लिए अपना कार्य करती है। संघर्ष का दूसरा नाम ही जीवन है। जो इस जीवन में संघर्ष करने से भागता है, संघर्ष करना नहीं चाहता, उसका व्यक्तित्व व जीवन अविकसित ही रह जाता है।

जीवन जैसा है उसी रूप में स्वीकार करने पर ही यहाँ जीवित रहा जा सकता है।

जीवन जैसा है उसी रूप में स्वीकार करने पर ही यहाँ जीवित रहा जा सकता है। यथार्थ का सामना करके ही आप जीवन-पथ पर चल सकते हैं। ऐसा ही नहीं हो सकता कि जीवन रहे और मनुष्य को बिपरितताओ का सामना न करना पड़े। यदि आप जीवन में आई विरोधी परिस्थितियों से हार बैठे हैं, अपनी भावनाओं के प्रतिकूल घटनाओं से ठोकर खा चुके हैं और फिर जीवन की उज्ज्वल संभावनाओं से निराश हो बैठे हैं तो उद्धार का एक ही मार्ग है -उठिए और जीवन पथ की कठोरताओं को स्वीकार कर आगे बढ़िये। तभी कहीं आप उच्य मंजिल तक पहुँच सकते हैं। जीना है तो यथार्थ को अपनाना ही पड़ेगा। और कोई दूसरा मार्ग नहीं है जो बिना इसके मंजिल तक पहुंचा दे।

शुद्ध विचारों की उपयोगिता

विचार आपसे कहते हैं, हमें मन के जेलखाने में ही घोट कर मत मारिए, वरन शरीर के कार्यों द्वारा जगत में आने दीजिये। मनुष्य उत्तम लेखक, योग्य वक्ता, उच्च कलाविद वह जो भी चाहे सरलतापूर्वक बन सकता हैं, लेकिन एक शर्त है कि वह अपने शुभ संकल्पों को क्रियाशील कर दे। उन्हें दैनिक जीवन में भी कर दिखाए। जो कुछ सोचता- विचारता है, उसे परिश्रम द्वारा, अपनी सामर्थ्य द्वारा साक्ष्य का रूप प्रदान करे। शुद्ध विचारों की उपयोगिता तभी प्रकट होगी, जब अन्तःकरण के चित्रों को शरीर के कार्यो द्वारा क्रियान्वित करने का प्रयत्न किया जायेगा।

गुरु-शिष्य संबंध बड़ा कोमल, किन्तु कल्याणकारी होता है।

गुरु-शिष्य संबंध बड़ा कोमल, किन्तु कल्याणकारी होता है। गुरु,शिष्य को पुत्रवत समझकर, उसे टेड़े-मेडे मार्गौ से निकाल ले जाते है, जिन्हे शिष्य के लिए समझ पाना कठिन होता है। इसलिए कई बार शिष्य अभिमान मे आकर गुरु की अवज्ञा कर जाता है, इच्छा तथा आदेश की अवहेलना करता है। यधपी गुरु उसे कुछ भी न कहे, किन्तु फिर भी वह संभावित लाभ से वंचित रह जाता है। इसके लिए शिष्य मे गुरु के प्रति संपूर्ण समर्पण की अवश्यकता है।