वायुप्रदूषण की रोकथाम

वन कटते जा रहे है। फलस्वरूप वायुप्रदूषण की रोकथाम का रास्ता बंद हो रहा है। जमीन में जड़ों की पकड़ न रहने से हर साल बाढ़े आती हैं, भूमि कटती है, रेगिस्तान बनते हैं। नदियों की गहराई कम होते जाने से पानी का संकट सामने आता है। फर्नीचर, मकान और जलावन तक के लिए लकड़ी मुश्किल हो रही है। वन काटने की अनेक हानियों को जानते हुए भी, आवास के लिए खाद्य के लिए सड़कों, स्कूलों और बाँधों के लिए जमीन तो चाहिए ही। यह सब जनसंख्या वृद्धि के दुष्परिणाम ही तो हैं। इन्हीं में से एक अनर्थ और भी जुड़ जाता है, शहरों की आबादी का बढ़ना। बढ़ते हुए शहर, घिसपिच की गंदगी के कारण नरक तुल्य बनते जा रहे हैं।

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दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ।

भारत देश के प्रमुख त्योहारों में दीपावली का विशेष स्थान है दिवाली का त्यौहार हिन्दूधर्म के कार्तिक महीने के अमावस्या के दिन पूरे धूमधाम से मनाया जाता है । जिस प्रकार प्रकाश से अँधेरे एक अंत हो जाता है उसी हमारे अच्छे कर्म से भी लोगो के जीवन में खुशिया आ सकती है इसलिए हम एक बने और नेक बने । आज विश्व में जिस प्रकार आतंकवाद का अंधकार बढ़ रहा है उसके रोकथाम के लिए हम सभी का एक होना आवश्यक है। आप सभी को प्रज्ञा युवा प्रकोष्ठ बिहार की और से दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ।

मार्गदर्शन : भविष्य निर्माण

​युवावस्था में यदि जीवन निर्माण का सही मार्गदर्शन मिल जाए तो जीवन के उपवन में अनेकानेक उपलब्धियों के पुष्प खिलते चले जाते हैं | इस अवस्था को भविष्य निर्माण की आधारशिला कहा जा सकता है | उपयुक्त दिशा निर्देशों के अभाव में, उपयुक्त मार्गदर्शन के अभाव में एवं उपयुक्त साथियों के अभाव में जीवन अनगढ़ बनता चला जाता है |

मार्गदर्शन : भविष्य निर्माण

​युवावस्था में यदि जीवन निर्माण का सही मार्गदर्शन मिल जाए तो जीवन के उपवन में अनेकानेक उपलब्धियों के पुष्प खिलते चले जाते हैं | इस अवस्था को भविष्य निर्माण की आधारशिला कहा जा सकता है | उपयुक्त दिशा निर्देशों के अभाव में, उपयुक्त मार्गदर्शन के अभाव में एवं उपयुक्त साथियों के अभाव में जीवन अनगढ़ बनता चला जाता है |

दया मनुष्य को दूसरों का दुःख दूर करने में प्रव्रित्त कराती है

दया मनुष्य को दूसरों का दुःख दूर करने में प्रव्रित्त कराती है पर निर्मोह या निर्ममत्व मनुष्य को दूसरों के सुख-दुःख से सम्बंधित होने से पीछे हटाता है! अतएव दया और मिर्ममत्व दोंनों के एक बराबर होने से चित्त संतुलित होता है!

आत्मिक संतुलन

आत्मज्ञान एवं आत्म सम्मान को प्राप्त करना और उनकी रक्षा करने के लिए मनुष्योचित मार्ग अपनाना यह जीवन का सतोगुणी स्वाभाविक क्रम है!यह श्रृंखला जब विश्रृंखलित हो जाती है,आत्मिक संतुलन बिगड़ जाता है तो पाप करने का सिलसिला चल पड़ता है!

दया मनुष्य को दूसरों का दुःख दूर करने में प्रव्रित्त कराती है

दया मनुष्य को दूसरों का दुःख दूर करने में प्रव्रित्त कराती है पर निर्मोह या निर्ममत्व मनुष्य को दूसरों के सुख-दुःख से सम्बंधित होने से पीछे हटाता है! अतएव दया और मिर्ममत्व दोंनों के एक बराबर होने से चित्त संतुलित होता है!