नवरात्र के पहले दिन माँ के रूप शैलपुत्री की पुजा की जाती है।

नवरात्र के पहले दिन माँ के रूप शैलपुत्री की पुजा की जाती है। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा। मटा शैलपुत्री का स्वरूप अति दिव्य है। माँ के दाहिने हाथ में त्रिशूल और माँ के बाएँ हाथ में कमाल का फूल सुशोभित है। माँ शैलपुत्री बैल पर सवारी करती हैं। माँ को समस्त वन्य जीव-जंतुओं का रक्षक माना जाता है। इनकी आराधना से आपदाओं से मुक्ति मिलती है। इसलिए दुर्गम स्थानो पर बस्तियां बनाने से पहले माँ शैलपुत्री की स्थापना की जाती है।

Advertisements

आत्मविस्तार और ईश्वर आराधना एक ही क्रिया के दो नाम हैं।

जो आत्मभाव का जितना विस्तार करता है ,अधिक लोगों को अपना समझता है ,दूसरों की सेवा सहायता करना आवश्यक कर्त्तव्य समझता है और उनके सुख–दुःख मानता है ,वह ईश्वर के उतना ही निकट है। आत्मविस्तार और ईश्वर आराधना एक ही क्रिया के दो नाम हैं।

अच्छे काम का प्रयोग अपने से ही आरंभ करना चाहिए ।

अच्छे काम का प्रयोग अपने से ही आरंभ करना चाहिए । हम सुधरें ,हमारा दृष्टिकोण सुधारे तो दूसरों का सुधार होना कुछ भी कठिन न रह जाएगा।

अपने अंतरंग को ऊँचा उठाएं ।

अपने अंतरंग को ऊँचा उठाएं । परिष्कृत चिंतन करें। उज्ज्वल भविष्य की आशा रखें। कर्त्तव्य को सही रीति से करने में आत्मसम्मान अनुभव करें।

मात्र ज्ञान संचय तो एक प्रकार का व्यसन है।

मात्र ज्ञान संचय तो एक प्रकार का व्यसन है। बुद्धि विलास इसे ही ज्ञान कहते हैं। उसे कतई निंदनीय तो नहीं ठहराया जा सकता, पर सार्थकता तभी मानी जानी है, जब कर्म में परिणति हो।

मानव-समाज का निर्माण नर नारी के संयोग से हुआ है!

मानव-समाज का निर्माण नर नारी के संयोग से हुआ है! समाज के स्थायित्व और संचालन के लिए जितनी आवश्यकता नर की है उससे किसी प्रकार कम नारी की नहीं!

मानव-समाज का निर्माण नर नारी के संयोग से हुआ है!

मानव-समाज का निर्माण नर नारी के संयोग से हुआ है! समाज के स्थायित्व और संचालन के लिए जितनी आवश्यकता नर की है उससे किसी प्रकार कम नारी की नहीं!