समय को व्यर्थ गँवाकर एक प्रकार की आत्महत्या कर रहे हैं।

जिस व्यक्ति में समय को खर्चने की, उसका सदुपयोग करने की सामर्थ्य नहीं होती तो समय उसे खर्च कर देता है। दिन -रात के चौबीस घंटे कम नहीं होते। इस समय को हम किस प्रकार व्यतीत करते हैं, इसका लेखा -जोखा करते चले तो हमें ज्ञात हो जाता है कि हम जी रहे हैं या समय को व्यर्थ गँवाकर एक प्रकार की आत्महत्या कर रहे हैं।

आत्मज्ञानी डूबे हुओं को निकालते और दुखियों का दुःख दूर करते हैं।

जिस प्रकार सूर्य भगवान नित्य परिक्रमा करते हुए संसार का अंधकार दूर करते, पुष्पों को, कमलों को विकसित करते जाते हैं। इसी प्रकार आत्मज्ञानी संत अपने सहज कार्यों से संसार बंधन में बंधे बंदियों को छुड़ाते, डूबे हुओं को निकालते और दुखियों का दुःख दूर करते हैं।

आडंबर, पाखण्ड और प्रपंच एक प्रकार से प्रच्छन्न की महत्ता भी बखानते हैं, अन्यथा जो आस्तिकता और धार्मिकता की महत्ता भी बखानते हैं, उन्हें स्वयं तो भीतर बाहर में से एक होना ही चाहिए

भोजन वैसा करें जो स्वस्थवर्धक हो ।

स्वस्थ ही सबसे बड़ा धन है । ये हम सभी जानते है किन्तु अपने शरीर के प्रति हम कितने सजग है ये विचार का विषय है। भोजन का शरीर के साथ साथ विचारों पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। किन्तु आज के भाग दौड़ की दुनिया में जहाँ लोग घंटो समय मोबाइल के बिता देते है किन्तु 10 मिनट का समय योग या ध्यान के लिए नहीं निकलते है। यही हाल भोजन के साथ भी है, घर का भोजन से ज्यादा होटल के भोजन को लोग पसंद करते है, जो कि कई रोगों का कारण है। इसलिए भोजन वैसा करें जो स्वस्थवर्धक हो ।

आप सभी को क़ृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।

जीवन के विभिन्न रहस्य को बताने वाले भगवान श्री क़ृष्ण का जन्म मानव जाति के उत्थान हेतु हुआ था। अपने जीवन काल में उन्होनें कई लीलाएँ की और उनसे समस्त जीव जगत को यह संदेश दिया की अधर्म और असत्य का मार्ग गलत है और सत्य का मार्ग ही परमात्मा का मार्ग है। आप सभी को क़ृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।

गायत्री सद्बुद्धि ही है।

गायत्री सद्बुद्धि ही है। इस महामंत्र में सद्बुद्धि के लिए ईश्वर से प्रार्थना की गई है। कुबुद्धि का शमन करने में गायत्री अचूक रामबाण मंत्र की तरह प्रभावशाली सिद्ध होते है। गायत्री मंत्र का प्रधान कार्य कुबुद्धि का निवारण है। गायत्री साधना आत्मबल बढ़ाने का अचूक आध्यात्मिक व्यायाम है।

अच्छे कर्मों का परिणाम सदैव अच्छा होता है।

अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हम हमेशा प्रयत्न करते हैं । हमारा दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास ही हमारे अस्त्र शस्त्र होते है। किन्तु इन सभी प्रयत्नो के पश्चात हमे कभी कभी असफलता प्राप्त होती है, जिससे हम काफी निराश हो जाते है और अपना मनोबल खो देते है। ऐसे समय में हमे गीता में श्री कृष्ण द्वारा कहे गए उन बातों को याद करनी चाहिए जिसमें उन्होनें ने कहा की किसी भी कार्य का परिणाम हमारे वश में नहीं। हमें अपने कर्मों को वश में करना चाहिए क्योंकि अच्छे कर्मों का परिणाम सदैव अच्छा होता है।

गुरु शिष्य संबंध बड़ा कोमल किन्तु कल्याणकारी होता है

गुरु शिष्य संबंध बड़ा कोमल किन्तु कल्याणकारी होता है। गुरु शिष्य को पुत्रवत समझकर उसे टेढ़े – मेढ़े मार्गो से निकाल ले जाते हैं, जिन्हें शिष्य के लिए समझा पाना कठिन होता है। इसलिए कई बार शिष्य अभिमान में आकर गुरु की अवज्ञा कर जाता है। इसके लिए शिष्य में गुरु के प्रति समर्पण की आवश्यकता है।

पहले रोटी और फिर धर्म।

पहले रोटी और फिर धर्म। सब बेचारे दरिद्री भूखों मर रहे हैं, तब हम उनमें व्यर्थ ही धर्म को ठूँसते हैं। किसी भी मतवाद से भूख की ज्वाला शांत नहीं हो सकती। तुम लाखों सिद्धांतों की चर्चा करो, करोड़ों संप्रदाय खड़े कर लो, पर जब तक तुम्हारे पास संवेदनशील हृदय नहीं है, जब तक तुम उन गरीबों के लिए वेदों की शिक्षा के अनुरूप तड़प नहीं उठते, जब तक उन्हीं अपने शरीर का ही अंग नहीं समझते, जब तक यह अनुभव नहीं करते कि तुम और वे दरिद्र और धनी, संत और पापी सभी उस एक असीम पूर्ण के जिसे तुम ब्रह्म कहते हो, अंश हैं, तब तक तुम्हारी धर्म-चर्चा व्यर्थ है।

शक्ति हमारे भीतर सोइ पड़ी है ,उसे जगाओ

हम उदार बने साहस पैदा करें और आध्यात्मिक जीवन की कठिनाइयों को झेलने के लिए उठकर खड़े हो जाए ,फिर देखे की जिस महानता की उपलब्धि के लिए हम निरंतर ललाईत रहते हैं वह सच्चे स्वरूप में मिलती है या नहीं |सत्य हमारे अंदर छुपा हुआ है ,उसे धर्म के द्वारा जाग्रत करो |शक्ति हमारे भीतर सोइ पड़ी है ,उसे जगाओ ,जीवन की सार्थकता का सही एक मात्र मार्ग है |