स्वंय को सदा सार्थक कार्यों में संलग्न रखना

स्वंय को सदा सार्थक कार्यों में संलग्न रखना, मन को अच्छे विचारों से ओत-प्रोत रखना, जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखना– ऐसे ही कुछ उपाय हैं, जिनसे यह पथ प्रशस्त किया जा सकता है और मन को चिंतामुक्त किया जा सकता है।

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मनुष्य की प्रधान विशेषता उसकी विचारशीलता है |

मनुष्य की प्रधान विशेषता उसकी विचारशीलता है | इसी आधार पर उसकी विचारणा, कल्पना, विवेचना, धारणा का विकास होता है | अन्य प्राणियों की विचार परिधि पेट प्रजनन, आत्मरक्षा जैसे प्रयोजनों तक सिमित रहती है | वे इसके आगे बढ़कर विश्व व्यवस्था, निजी जीवनचर्या, भावी सम्भावना आदि के सम्बद्ध में कुछ सोच नहीं पाते, अधिक सुविधा पाने और प्रतिस्पर्द्धा का आक्रमण करने जैसा आवेश भी यदाकदा उभरते रहते हैं | ज्यों-त्यों करके समय बिताते हैं और नियतिक्रम के अनुसार मृत्यु के मुख में चले जाते हैं |

शिक्षक को अपनी गरिमा का बोध होना चाहिए।

शिक्षक को अपनी गरिमा का बोध होना चाहिए। सौभाग्य से आज शिक्षक की स्थिति औसत भारतीय नागरिक से कहीं अच्छी है। उसके समक्ष धनापार्जन की नहीं, देश के भाग्य विधाताओं के निर्माण की चिंता होनी चाहिए। शिक्षक वह सौभाग्यशाली प्रतिभा है, जिसके हाथ सीधे गीली माटी तक पहुँचते हैं। समाज को बदलने के लिए आज संसाधनों की कमी नहीं है, सृजनात्मक विचारों की जरूरत है। यह दायित्व शिक्षकों को ही आगे बढ़कर निभाना चाहिए।

जीवन को सफल, उच्च एवं पवित्र बनाने के लिए स्वाध्याय की बड़ी आवश्यकता है।

जीवन को सफल, उच्च एवं पवित्र बनाने के लिए स्वाध्याय की बड़ी आवश्यकता है। किसी भी ऐसे व्यक्ति का जीवन क्यों न देख लिया जाये, जिसने उच्चता के सोपानों पर चरण रखा है। उसके जीवन में स्वाध्याय को विशेष स्थान मिला होगा। स्वाध्याय के अभाव में कोई भी व्यक्ति महान अथवा ज्ञानवान नहीं बन सकता।

अपने पुरुषार्थ को इस स्तर का सिद्ध करे कि यह मात्र दैवी अनुदानों के आधार पर ही समुन्नत बनकर नहीं रह रहा है, वरन उसका निज का पुरुषार्थ भी समुचित मात्र में सम्मिलित रहा है | यह प्रतिभा ही है जिसके बल पर वह अन्यान्यों की तुलना में अधिक सुसंस्कृत और समुन्नत बनता है |

आत्मा की अमरता

आत्मा की अमरता की,परमात्मा की न्यायशीलता की और मानव जीवन के कर्तव्यों की जिससे जानकारी प्राप्त होती है और जिससे कुविचारों और दुष्कर्मों के प्रति घृणा एवं सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती हो,वही ज्ञान है|

संसार को त्रस्त कर रही वर्तमान परिस्थितियों से हम सभी अवगत हैं |

संसार को त्रस्त कर रही वर्तमान परिस्थितियों से हम सभी अवगत हैं | चारों और शोषण, अत्याचार, अनाचार, का एकछत्र राज्य है | प्रत्येक व्यक्ति अशांत और असंतुलित है, अत्याचारी भी और पीड़ित भी | प्रकृति और मानव दोनों की उग्रता चरम सीमा पर है | इन उग्राताओं ने व्यक्ति के विचार और व्यव्हार बदल डाले हैं, मानव -मूल्यों को लुप्तप्राय कर दिया है और जीवन जीने के उद्देश्यों को ही तहस -नहस कर दिया है और लगता कि हम सब जलते हुए नरक में जी रहे हैं |