मुक्ति को परम पुरुषार्थ माना गया है।

मुक्ति को परम पुरुषार्थ माना गया है। कैदी जेल से छूटता है,छात्र कॉलेज छोड़ता है, गर्भ से बालक धरती पर आता है, तो उसे प्रसन्नता भी होती है और सुविधा भी मिलती है। भवबंधनों से छुटकारा पाकर मनुष्य भी समस्त शोक-संतापों से रहित होकर सच्चा जीवन-लाभ लेता है। यह जीवित रहते हुए भी किया जा सकता है।

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आनंदमय जीवन ही ईश्वर की योजना है।

संसाररूपी इस जीवन-समर में, जो स्वंय को आनंदमय बनाए रखता है, दूसरों को भी हँसाता रहता है ,वह ईश्वर का प्रकाश ही फैलता है। यहाँ जो कुछ भी है, आनंदित होने तथा दूसरों को प्रसन्नता देने के लिए ही उपजाया गया है। जो कुछ भी बुरा व अशुभ है, वह मनुष्य को प्रखर बनाने के लिए मौजूद है। जो प्रतिकूलताओं से डरकर रो पड़ता है, कदम पीछे हटाने लगता है, उसकी आध्यात्मिकता पर कौन विश्वास करेगा।

संसार में दो शक्तियाँ हैं।

संसार में दो शक्तियाँ हैं। एक शक्ति वह है, जो ताकत के रूप में है, जो एटम में से उदय होती है और जो फोर्स कहलाती है। यह सारे विश्व में ताकत के रूप में, बिजली के रूप में फैली हुई है और जो हमारे शरीर को चलाती है। एटम को चलाती है, रेलगाड़ी को चलाती है। यह ताकत है, जो तरह-तरह के काम करती है। यह पदार्थ की शक्ति है।

ज्ञानी पुरुष अपना व्यक्तित्व बुरों के बीच भी ऊँचा बनाए रखते हैं।

दूध में पानी मिलाया जाए तो घुल जाएगा, किंतु उसी से निकाला हुआ मक्खन ऊपर तैरता रहता है। आत्महीनताग्रस्त लोग मनुष्यों की भीड़ में वैसे ही बन जाते हैं, किंतु ज्ञानी पुरुष अपना व्यक्तित्व बुरों के बीच भी ऊँचा बनाए रखते हैं।

भारत का युवा वर्ग विचार करना सीखे

यदि भारत को अपना अस्तित्व बनाए रखान है और विश्व में अपना निर्धारित कार्य करना है तो हमारी पहली आवश्यकता होगी कि भारत का युवा वर्ग विचार करना सीखे– सभी विषयों पर विचार करना, स्वतंत्र रूप से, वस्तुओं की तह तक जाकर, पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर, हर प्रकार की रूढ़िवादिता से पार होना पड़ेगा।

मनुष्य सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है।

मनुष्य जीवन का अर्थ केवल मात्र शरीर और श्वांस का समागम नहीं है। यदि जीवन का अर्थ मात्र यही होता तो बिना हाथ, सिर, पैर,के जमीन पर रेंगने वाले कीड़ों, मकोड़ों और मनुष्य में कोई अन्तर नहीं रहता। मनुष्य सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है।

संसार में कोई चीज व्यर्थ या बेकार नहीं है।

संसार में कोई चीज व्यर्थ या बेकार नहीं है। अगर हम ईश्वर की दी हुई बुद्धि से ठीक तरह काम लें और दृदय से परिश्रम करें तो कोई कारण नहीं कि हम असम्भव समझे जाने वाले कामों को भी सम्भव न बना सकें।