सत्य तीर्थ है, क्षमा इन्द्रिय नियंत्रण भी तीर्थ है।

सत्य तीर्थ है, क्षमा इन्द्रिय नियंत्रण भी तीर्थ है। सरलता भरा स्वभाव एवं जीव दया भी तीर्थ है। दान, मन का संयम, संतोष, ब्रह्मचर्य, प्रियवचन बोलना भी तीर्थ है। ज्ञान धैर्य, तप को भी तीर्थ कहा गया है तीर्थ मे सबसे श्रेष्ठ तीर्थ है अंतःकरण की पवित्रता जिसने दम रूपी तीर्थ मे स्नान कर मन के मैल को धो डाला वही शुद्ध है

निरंहकारी बनो।

निरंहकारी बनो। निरंहकारी का प्रथम चिन्ह है वाणी की मिठास। वाणी व्यक्तित्व का हथियार है। अपनी विनम्रता,दूसरो का सम्मान व बोलने में मिठास,यही व्यक्तित्व के प्रमुख हथिरयार है।

चरित्र मानव जीवन की नींव है।

चरित्र मानव  जीवन की नींव है। यदि नींव जर्जर और कमजोर होगी,तो जीवन का देवालय विश्वास पूर्वक खड़ा न रह सकेगा। बुरे से बुरे आदमी भी चाहे ऊपर से मानता या कहता न हो,पर मन ही मन सच्चरित्र व्यक्ति के प्रति एक आदर का भाव रखता है,उससे डरा भी करता है।

शरीर माने श्रम और समय इन्हे भगवान के खेत में बोओ।

शरीर तुम्हारे पास है। शरीर माने श्रम और समय इन्हे भगवान के खेत में बोओ। इसके लिए तुम अपने श्रम,समय और शरीर को खर्च कर डालो वह सौ गुणा होकर मिलेगा ।

ऊँचे उद्देश्यों का होना सराहनीय है पर उनकी सफलता के लिए ऐसे कर्मठ समर्थकों की मण्डली चाहिए जो लक्ष्य के प्रति समर्पित हो मानो वही इमान है और वही भगवान है।

परिस्थितियों मनुष्य के अपने हाथ की बात है।

परिस्थितियों मनुष्य के अपने हाथ की बात है। सदा जीतने वाला पुरुषार्थी वह जो सामर्थ्य के अनुसार परिस्थितियों को बदलता देता है, किन्तु यदि वे बदलती नहीं तो स्वंय अपने आपको उन्हीं के अनुसार बदल लेता है। उन्नति की मूल वस्तु महत्वाकांक्षा है।

कष्ट को झेलने का एक मात्र तरीका है प्रभु के प्रति अपार एवं अंतहीन आस्था!

कष्ट को झेलने का एक मात्र तरीका है प्रभु के प्रति अपार एवं अंतहीन आस्था!कभी भी न दु:खो से घबराना चाहिए और न इनसे पलायन करना चाहिए। अपने कष्टो को शांत और धैर्य पूर्वक झेल जाना चाहिए। कष्ट से बिना घबराए उसे धैर्य पूर्वक सहन करना चाहिए।

गायत्री सद्बुद्धि ही है।

गायत्री सद्बुद्धि ही है। इस महामंत्र में सद्बुद्धि के लिए ईश्वर से प्रार्थना की गई है। कुबुद्धि का शमन करने में गायत्री अचूक रामबाण मंत्र की तरह प्रभावशाली सिद्ध होते है। गायत्री मंत्र का प्रधान कार्य कुबुद्धि का निवारण है। गायत्री साधना आत्मबल बढ़ाने का अचूक आध्यात्मिक व्यायाम है।

अपने आप से मतलब है परा चेतना से जो हमारे भीतर है इसको स्व कहा जाता है,आत्मा कहा गया है।

अपने आप से मतलब है परा चेतना से जो हमारे भीतर है इसको स्व कहा जाता है,आत्मा कहा गया है। अपने आप की उपासना किया कीजिए। हमारा जीवन पारस है। हमारा जीवन कल्पवृक्ष है। पुरुषार्थ कीजिए बुराइयों को छोड़ने का पुरुषार्थ अच्छाइयों को बढ़ाने का पुरुषार्थ। हमारा जीवन कामधेनु है।

गुरु शिष्य संबंध बड़ा कोमल किन्तु कल्याणकारी होता है।

गुरु शिष्य संबंध बड़ा कोमल किन्तु कल्याणकारी होता है। गुरु शिष्य को पुत्रवत समझकर उसे टेढ़े – मेढ़े मार्गो से निकाल ले जाते हैं, जिन्हें शिष्य के लिए समझा पाना कठिन होता है। इसलिए कई बार शिष्य अभिमान में आकर गुरु की अवज्ञा कर जाता है। इसके लिए शिष्य में गुरु के प्रति समर्पण की आवश्यकता है।