स्वनेतृत्व-परनेतृत्व

स्वनेतृत्व अर्थात स्वयं के द्वारा या दूसरों के द्वारा निर्धारित छोटे-छोटे लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए स्वयं मार्गदर्शक की भूमिका निभाना और निर्धारित समयावधि में अपना लक्ष्य प्राप्त करना जबकि परनेतृत्व में व्यक्ति अपना मार्गदर्शन करने के साथ साथ दूसरों का मार्गदर्शन भी करता है।

प्रत्येक व्यक्ति के अंदर नेतृत्व क्षमता का गुण मौजूद है।

प्रत्येक व्यक्ति के अंदर नेतृत्व क्षमता का गुण मौजूद है। कुछ व्यक्ति इसका प्रयोग स्वयं के लिए ही कर पाते हैं; जबकि कुछ व्यक्ति इसका प्रयोग स्वयं के अलावा एक बड़े समूह के लिए या अन्य व्यक्तियों पर कर पाते हैं।

खोया हुआ समय किसी प्रकार नहीं लौट सकता

खोई दौलत फिर कमाई जा सकती है। भूली हुई विद्या फिर याद की जा सकती है। खोया स्वास्थ्य चिकित्सा द्वारा लौटाया जा सकता है पर खोया हुआ समय किसी प्रकार नहीं लौट सकता, उसके लिए केवल पश्चाताप ही शेष रह जाता है। जिस प्रकार धन के बदले में अभिष्ठित वस्तुएँ खरीदी जा सकती हैं, उसी प्रकार समय के बदले में भी विद्या, बुद्धि, लक्ष्मी कीर्ति आरोग्य, सुख -शांति, मुक्ति आदि जो भी वस्तु रुचिकर हो खरीदी जा सकती है।

जीवन भी है एक होली

जीवन में आने वाली विभिन्न परिस्थितियां जीवन के अलग अलग रंगो को दर्शातें हैं। हमें उन सभी को स्वीकार कर अपने जीवन पथ पर निर्भय होकर चलते रहना चाहिए। होली रंगो का पर्व है और हर रंग अपने आप में एक अलग पहचान रखती है। अतः इस पवन पर्व को नए उत्साह से मनाये।

प्रज्ञा युवा प्रकोष्ठ बिहार की ओरसे आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएं

साहस ही एक मात्र ऐसा साथी है

कठिनाइयों से पार पाने और प्रगति पथ पर आगे बढ़ने के लिए साहस  ही एक मात्र ऐसा साथी है ,जिसको साथ लेकर मनुष्य एकाकी भी दुर्गम दीखने वाले पथ पर चल पड़ने एवं लक्ष्य तक जा पहुँचने में समर्थ हो सकता है ।

शिक्षा जीवन के सर्वागिन विकास की व्याख्या करती है।

शिक्षा जीवन के सर्वागिन विकास की व्याख्या करती है। वह विकास की तकनीकी बनाती है । इससे पता चलता है कि जीवन को कैसे जिया जाए । बाहरी दुनिया मे आत्मनिर्भरता कि कला शिक्षा के द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है।

आत्मविजय ही विश्वविजेता कहलाता है।

अपने अंदर क्या है, इसे हमसे अच्छा कौन जान सकता है ! दूसरों के दोष देखना सरल है, अपने दोष देख पाना सबसे कठिन। जो ऐसा आत्मपरिष्कार कर लेता है, वह आत्मविजय ही विश्वविजेता कहलाता है।

अपने अंदर क्या है, इसे हमसे अच्छा कौन जान सकता है !

अपने अंदर क्या है, इसे हमसे अच्छा कौन जान सकता है ! दूसरों के दोष देखना सरल है, अपने दोष देख पाना सबसे कठिन। जो ऐसा आत्मपरिष्कार कर लेता है, वह आत्मविजय ही विश्वविजेता कहलाता है।

तुम क्षुद्र जीव नहीं हो, सम्राटों के सम्राट परमात्मा के तुम अमर-पुत्र राजकुमार हो।

तुम क्षुद्र जीव नहीं हो, सम्राटों के सम्राट परमात्मा के तुम अमर-पुत्र राजकुमार हो। उसने तुम्हारे ऊपर इतना श्रम इसलिए नहीं किया है, कि कीड़ों की तरह जिंदगी बिताओ और कुत्तों की मौत मर जाओ। अहंकार का घमंड दूसरी बात है। भौतिक वस्तुओं को अपनी समझकर उन पर गुरूर करना अज्ञान है, परंतु आत्मा के दिव्य स्वरूप की झांकी करना आत्म-दर्शन है, पुण्य है,कर्तव्य है,आत्म-सम्मान है। अहंकार और आत्म सम्मान की तुलना करना मूर्खता है। अपने अंदर परमात्मा का पवित्र अंश होने का विश्वास कर लेने पर कोई व्यक्ति आत्म-तिरस्कार नहीं कर सकता। अपने को नाचीज समझने का अर्थ है, अपने को परमात्मा से बहुत दूर समझना।