सदुपदेश एक ठोस प्रेरक विचार है ।

सदुपदेश एक ठोस प्रेरक विचार है । जैसे कोयले के छोटे से कण में विध्वंसकारी विपुल शक्ति भरी होती है , वैसे ही प्रत्येक सदुपदेश शक्ति का एक ज्योति – पिंड है । यह वह अंकुश है जो सत्पथ से विचलित होते ही हमारे अंदर एक विशेष विचार स्थापित करते हैं ।

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व्यक्ति अपने भाग्य का निर्माता आप है

व्यक्ति अपने भाग्य का निर्माता आप है,किन्तु यह वाक्य केवल तपस्वियों पर ही लागू होता है,जो अपनी प्रचंड तप-ऊर्जा द्वारा इन संस्कारों को नष्ट करने की क्षमता रखते हैं। तपस्वी अपने जीवन की दिशा स्वयं निर्धारित करते हैं ,किन्तु सामान्य व्यक्तियों का जीवन तो पूर्णत: संस्कारों के अधीन होता है।

उत्पत्ति सम्पदा सभी में समान्न रूप से बाँट जानी चाहिए

ऊँचा महल खड़ा करने के लिए किसी दूसरी जगह गड्ढे बनाने पड़ते हैं। मिट्टी, पत्थर, चूना आदि जमीन को खोदकर ही निकाला जाता है। एक जगह टीला बनता है तो दूसरी जगह खाई बनती है। संसार में दरिद्रों, अशिक्षितों, दुःखियों, पिछड़ों की विपुल संख्या देखते हुए विचार उठता है कि उत्पत्ति सम्पदा यदि सभी में बँट गई होती तो सभी लोग लगभग एक ही तरह का सामान स्तर का जीवन जी रहे होते है।

जिसे तुम अच्छा मानते हो यदि तुम उसे आचरण में नहीं लाते तो वह तुम्हारी कायरता है।

जिसे तुम अच्छा मानते हो यदि तुम उसे आचरण में नहीं लाते तो वह तुम्हारी कायरता है। हो सकता कि भय तुम्हें ऐसा न करने देता हो। लेकिन इनसे न तो तुम्हारा चरित्र ऊंचा उठेगा और न ही तुम्हें गौरव मिलेगा। मन में उठने वाले अच्छे विचारों को दबाकर तुम बार-बार जो आत्म हत्या कर रहे हो, आखिर उनसे तुमने किस लाभ का अंदाजा लगाया है। शांति और तृप्ति आचारवान व्यक्ति को ही प्राप्त होती है।

संकल्प शब्दभेदी बाण की तरह है

कामनाएँ उबलते दूध के समतुल्य खाली बरतन को भी भरा दिखा देती है और कुछ ही समय में बैठ भी जाती है, किन्तु संकल्प शब्दभेदी बाण की तरह है, जो निशाना वेधकर ही रहता है।

संतोष करना व्यक्ति को परिश्रमी बनाता हैं।

श्रम का उचित मूल्य प्राप्त कर उसमें संतोष करना व्यक्ति को नीतिनिष्ठ तो बनाता ही है,परिश्रमी भी बनाता हैं। क्योंकि तब किन्हीं की विवशताओं या परिस्थितियों का लाभ उठाने की बात दृष्टि में नहीं रहती । यह नियम निष्ठा अपना लेने पर व्यक्ति का पुरुषार्थ प्रखर होता जाता है।

विचारशील व्यक्ति को समाज सुधारनेका प्रयत्न करना ही होगा

कोई विचारशील व्यक्ति यदि अपने पिछडे और बिगड़े समाज को सुधारने के लिए प्रयत्न नहीं करता तो उसकी उपेक्षा भी एक दंडनीय अपराध ही मानी जाएगी । भगवान की दण्ड संहिता में असामाजिक प्रवृति भी एक पाप है और जो उदासीन बनकर अपने आप में ही सीमित रहता है , वह अपनी क्षुदता, संकीर्ण्णता और स्वार्थपरता का दंड अन्य प्रकार के अपराधियों की तरह ही भोगता है ।