जीवन एक संग्राम है

जीवन एक संग्राम है, जिसमें विजय केवल उन्हीं को मिलती है, जो दृढ़ और उन्नत मनोबल का कवच धारण किए रहते हैं और जो अपने निहित पराक्रम और पौरुष की उत्कृष्टता सिद्ध करते हैं ।शारीरिक स्वास्थ ठीक हो, पर मनोबल न हो , तो आदमी मानसिक आघात से अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है । अविकसित मनोबल होने के कारण हमारी योजनाएँ सफल नहीं होती । हमारा मन हारा रहता है तो शरीर भी हारता है और हम पराजित हो जाते हैं ।

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जीवन की सर्वोपरि आवश्यकता है – लक्ष्य का चयन।

जीवन की सर्वोपरि आवश्यकता है – लक्ष्य का चयन। इसके लिए परम आवश्यक है – लक्ष्य की खोज। लक्ष्य की खोज करते समय, इसे निर्धारित करते समय अपनी क्षमता, परिस्थिति एवं जीवन – मूल्यों की पड़ताल करना आवश्यक है –,क्योंकि इसी से मिलने वाले तथ्यों का विवेचन-विश्लेषण करके हम सही जीवन-लक्ष्य का निर्धारण कर सकते हैं।

समाज में श्रेस्ठ प्रवृतियाँ बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण ढंग ह

समाज में श्रेस्ठ प्रवृतियाँ बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण ढंग है-श्रेस्ठ कार्य करने वालों को सम्मान देना, सहयोग देना तथा प्रशंसा-प्रोत्साहन प्रदान करना।

इस संसार में प्यार करने लायक दो ही वस्तुएँ ह

इस संसार में प्यार करने लायक दो ही वस्तुएँ हैं , एक दु:ख , दूसरा श्रम । दु:ख के बिना हृदय निर्मल नहीं होता और श्रम के बिना मनुष्यत्व का विकास नहीं होता ।

प्रज्ञा युवा प्रकोष्ठ की ओर से गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ

मातृभूमि के सम्मान एवं उसकी आजादी के लिए असंख्य वीरों ने अपने जीवन की आहुती दी थी । महान देश भक्तों के त्याग और बलिदान के परिणाम स्वरूप हमारी देश गणतांत्रिक देश हो सका। गणतंत्र (गण + तंत्र) का अर्थ है जनता के द्वारा जनता के लिए शासन । इस पर्व का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योकि इसे सभी जाति एवं वर्ग के लोग एक साथ मिलकर मानते हैं।
प्रज्ञा युवा प्रकोष्ठ की ओर से गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ ।

बाहर से दिखाना चाहते हैं, वैसे ही वास्तव में हो भी ।

दुनिया में इज्जत के साथ जीने का सबसे छोटा और सबसे शर्तिया उपाय है की हम जो कुछ बाहर से दिखाना चाहते हैं, वैसे ही वास्तव में हो भी ।

धर्म का चमत्कार से कोई वास्ता नही है|

धर्म का चमत्कार से कोई वास्ता नही है| धर्म तो प्रकृति द्वारा निर्मित विधि है| इसे समझने-स्वीकारने से हमारा जीवन ही कल्पतरु बन जाता है| अपने आप ही धर्म हमें–हममें से हरेक को मनोवांछित फल देने लगता है| धर्म किसी को आश्रित, परमुखापेक्षी, पारावलंबी नही बनाता। यह तो जीवन को परम स्वतंत्र व संपूर्ण रूप से मुक्त करता है