गुरु शिष्य संबंध बड़ा कोमल किन्तु कल्याणकारी होता है।

गुरु शिष्य संबंध बड़ा कोमल किन्तु कल्याणकारी होता है। गुरु शिष्य को पुत्रवत समझकर उसे टेढ़े – मेढ़े मार्गो से निकाल ले जाते हैं, जिन्हें शिष्य के लिए समझा पाना कठिन होता है। इसलिए कई बार शिष्य अभिमान में आकर गुरु की अवज्ञा कर जाता है। इसके लिए शिष्य में गुरु के प्रति समर्पण की आवश्यकता है।

सफलता के लिए आवश्यक है, अपने कर्तव्यों का समुचित रूप से पालन करना।

सफलता के लिए आवश्यक है, अपने कर्तव्यों का समुचित रूप से पालन करना। समय की चाल को पहचानते हुए परिस्थितियों के साथ सुमेल स्थापित करना एवं भावुकता से दूर रहकर विवेक एवं वैराग्य का अभ्यास करना सफलता का मूलमंत्र है। सफलता के लिए विवेक एवं वैराग्य की सवौपरि आवश्यकता है, क्योंकि विवेक उचित एवं अनुचित की समझ पैदा करता है।

ईश्वर उपासना आत्मा की वैसी ही आवश्यकता है , जैसी शरीर को प्राण की ।

ईश्वर उपासना आत्मा की वैसी ही आवश्यकता है , जैसी शरीर को प्राण की । भगवान की उपासना का अर्थ है -भगवान के पास बैठना । पारस से छुए बिना लोहा सोना कैसे बने ? ईश्वर के समीप पाहुचे बिना आत्मा की प्यास बुझती नही है । उपासना की प्रक्रिया आत्मा को परमात्मा की और उन्मुख करती है ।

जिंदगी एक पहेली हैं।

जिंदगी एक पहेली हैं। इसके उजालो में अँधेरा भी लिपटा रहता हैं, सुख के साथ दुख भी जुड़ा रहता हैं। जो चमकता हैं उसका बुझना सुनिश्चित हैं, परंतु श्रेष्ठ कर्म की चमक कभी नहीं खोती। सच्चिंतन एबं निष्काम सेवा का सौंदर्य कभी मलिन नहीं होता हैं।मानविये मुल्यों एबं गुणों का सौंदर्य कभी नष्ट नहीं होता हैं।

अध्यात्म का प्रवेश हुआ या नहीं

मनुष्य के जीवन मे अध्यात्म का प्रवेश हुआ या नहीं, इसे परखने के लिए सच्ची कसौटी यह है कि ये जाँचा जाए कि उसके अंतरंग में सच्चाई के लिए, ऊँचे आदर्शो के लिए और उत्कृष्ट सिद्धांतों के प्रति मर मिटने का जज्बा पैदा हुआ अथवा नहीं। अच्छी बाते सुनने में भले सभी को लगती हैं। पर उस राह पर चलने के लिए कदम कुछ ही क्रांतिकारियों के उठते हैं।

संसार के सफलता का मूल मंत्र है- प्रबल इच्छाशक्ति

संसार के सफलता का मूल मंत्र है- प्रबल इच्छाशक्ति इसी के बल पर विधा, संपति और साधनों का उपार्जन होता है। यही वह आधार है जिस पर आध्यात्मिक तपस्याएँ और साधनाएँ निर्भर रहती है।

प्रार्थना विश्वास की प्रतिध्वनि है।

प्रार्थना विश्वास की प्रतिध्वनि है।रथ के पहियों में जीतना अधिक भार होता है, उतना ही गहरा निशान वे धरती में बना देते है। प्रार्थना की रेखाएँ लक्ष्य तक दौड़ जाती है, और मनोवांधित सफलता खींच लाती है। प्रार्थना आत्मा की आध्यात्मिक भूख है। शरीर की भूख अन्न से मिटती है, इससे शरीर को शक्ति मिलती है। उसी तरह आत्मा की आकुलता को मिटाने और उसमें बल भरने की सत साधना परमात्मा की ध्यान -अराधना ही है।

“यदि आप जीवन में सफलता ,उन्नति ,संपन्नता एवं समृध्दि चाहते है तो स्वावलंबी बनिए ।

“यदि आप जीवन में सफलता ,उन्नति ,संपन्नता एवं समृध्दि चाहते है तो स्वावलंबी बनिए । आत्मविश्वास में वह ताकत है जो हजार विपत्तियों का सामना कर उन पर पूरी – पूरी विजय प्राप्त कर सकती है । यही मनुष्य का सच्चा मित्र और उसकी सबसे बड़ी पूंजी हैं ।

जो परमार्थ कार्य में लिप्त होगा उसका स्वार्थ स्वत: सिध्द होगा ।

जो परमार्थ कार्य में लिप्त होगा उसका स्वार्थ स्वत: सिध्द होगा । परमार्थ यानि ईश्वर का सही अर्थों में भजन – सारी विश्व वसुधा को और भी अधिक सुंदर सबके लिए रहने योग्य बनाना , सबके हित के निमित्त कार्य करना , अपना ही नहीं विश्व मानवता के हित का सदेव विचार कर सभी कर्म करना । अपने आस – पास को और अच्छा बनाना ,अपने अंतरंग को निर्मल बनाना ।

एक वीर की भाँति आगे बढ़ जाओ ।

एक वीर की भाँति आगे बढ़ जाओ । बाधाओं की परवाह मत करो । जब मानव शरीर प्राप्त हुआ है तो भीतर की आत्मा को जगाकर कहो – मुझे अभय प्राप्त हो गया है । उठो जागो और लक्ष्य को प्राप्त किए बिना रुको ।