वर्ण–धर्म का प्रोत्साहित करना आत्मघाती ही हो सकता है।

व्यवसाय के आधार पर वंश परंपरागत जाति चल सकती है और भले–बूरे कर्मो के आधार पर ऊँच- नीच का निर्धारण किया जा सकता है। इन क्रांतिकारी परिवर्तनों से निश्चित ही वर्ण–व्यवस्था का समयानुकूल पुनर्निर्धारण होगा। आज जो स्थिति है उसके रहते वर्ण–धर्म का प्रोत्साहित करना आत्मघाती ही हो सकता है।

आसक्ति, घृणा और विभ्रम उस मन मे प्रवेश करते है, जो आत्मनिष्ठ ध्यान से विरक्त होता है।

जिस प्रकार वर्षा की बूंदे उस घर मे टपकती है, जिसकी छ्प्पर ठीक नहीं होती, इसी प्रकार आसक्ति, घृणा और विभ्रम उस मन मे प्रवेश करते है, जो आत्मनिष्ठ ध्यान से विरक्त होता है।

हमें विश्व के क्रूर तथा स्वार्थी व्यक्तियों से कोई संबंध नहीं रखना चाहिए।

हमें विश्व के क्रूर तथा स्वार्थी व्यक्तियों से कोई संबंध नहीं रखना चाहिए। क्योंकि वे तो जंगली पशु के समान हैं जो कभी भी हानी पहुंचा सकते है।

जीवन को अधिकाधिक कठोर और कर्मठ बनाने में…

जीवन को अधिकाधिक कठोर और कर्मठ बनाने में कठिनाइयों की जिस प्रकार आवश्यकता है उसी प्रकार चरित्र-निर्माण के लिए भी कठिनाइयों की उपयोगिता है। मनुष्य का सहज स्वभाव है कि उसे जितनी ही अधिक छुट मिलती है, सुख-सुविधाएं प्राप्त होती है, वह उतना ही निकम्मा और आलसी बनता जाता है और एक प्रमादपूर्ण जीवन संसार कि सारी बुराइयों और व्यसनों का श्रमदान है। खाली और निठ्ठला बैठा हुआ व्यक्ति सिवाय खुराफात करने के और क्या कर सकता है। यही कारण है कि उत्तराधिकार में सफलता पाए हुए व्यक्ति अधिकतर व्यसनी और विलासी हो जाते है।

वही व्यक्ति जीवन में सफल हुए हैं जिन्होंने समय कि कीमत पहचानी है।

वही व्यक्ति जीवन में सफल हुए हैं जिन्होंने समय कि कीमत पहचानी है। सफलता के अवसर जीवन में आ सकते हैं, परंतु समय कि अनुकूलता का होना भी आवश्यक है। मनुष्य समय का उपयोग सही समय पर करता है, तभी सफल होता है। अवसर पर उपयुक्त कार्य कर लेना ही आवश्यक है। समय-समय से ही सभी कार्य अच्छे लगते हैं। जो समय बरबाद करता है,वही बाद के दिनों मे पछताता है तथा वक्त के थपेरे खाता है।

उत्तराधिकार में सफलता पाए हुए व्यक्ति अधिकतर व्यसनी और विलासी हो जाते है।

जीवन को अधिकाधिक कठोर और कर्मठ बनाने में कठिनाइयों की जिस प्रकार आवश्यकता है उसी प्रकार चरित्र-निर्माण के लिए भी कठिनाइयों की उपयोगिता है। मनुष्य का सहज स्वभाव है कि उसे जितनी ही अधिक छुट मिलती है, सुख-सुविधाएं प्राप्त होती है, वह उतना ही निकम्मा और आलसी बनता जाता है और एक प्रमादपूर्ण जीवन संसार कि सारी बुराइयों और व्यसनों का श्रमदान है। खाली और निठ्ठला बैठा हुआ व्यक्ति सिवाय खुराफात करने के और क्या कर सकता है। यही कारण है कि उत्तराधिकार में सफलता पाए हुए व्यक्ति अधिकतर व्यसनी और विलासी हो जाते है।

थोड़ा समय अपने बारे में सोचें कि हम क्या हैं ?

यदि हमें स्वयं को समझना है, जानना है, तो सबसे पहले हमें अपने जीवन के नजदीक आना होगा और इसके लिए है – उपासना, आत्मबोध-तत्वबोध की साधना। थोड़ा समय अपने बारे में सोचें कि हम क्या हैं ? हम ऐसे क्यों हैं ? हम क्या कर सकते हैं ? हमारे भीतर क्या संभावनाएं हैं ? उन्हें किस तरह से निखारना है ? और इसके लिए जो एक आदर्श विधि- व्यवस्था परमपुज्य गुरुदेव बताते हैं, उसमें चार बातें हैं – 1. श्रम, 2. सेवा, 3. सदाचार, 4. स्वाध्याय

आप अपना लक्ष्य स्थिर कीजिए।

आप अपना लक्ष्य स्थिर कीजिए। किसी आदर्श के लिए अपना जीवन लगाना चाहते हैं, यह निश्चित कीजिए। तत्पस्चात उसी की पूर्ति में मन, वचन और कर्म से लग जाइए। लक्ष्य के प्रति तन्मय रहना मनुष्य की इतनी बड़ी विशेषता, प्रतिष्ठा, सफलता और महानता है कि उसकी तुलना में अनेकों प्रकार के आकर्षक गुणों को तुच्छ ही कहा जायगा।

नियमितता सफल जीवन की प्रथम ही नहीं प्रधान और अनिवार्य आवश्यकता है।

नियमितता सफल जीवन की प्रथम ही नहीं प्रधान और अनिवार्य आवश्यकता है। समय सुर कार्य की योजनाबद्ध रूप से दिनचर्या बनाने और उस पर दृढ़तापूर्वक आरूढ़ रहने का नाम ही “नियमितता” है।