आधुनिक होने की चाह

आज हमारे देश में भी ऐसी संस्कृति फैलती जा रही हैं जहाँ आधुनिक होने की चाह में दौड़ रही युवा पीढ़ी आकर्षण के प्रभाव से प्रभावित होकर कभी कहीं तो कभी कहीं संबंध स्थापित करती हैं। जहाँ स्वार्थ सध गया वहाँ शीघ्र ही रिश्ते समाप्त हो जाते हैं।

हमारी सोच में कुछ अशुद्धियाँ है, जिन्हें जानकर दूर कर लेना हम सबके लिए जरूरी हैं।

हम समझते हैं कि अभिभाक, शिक्षक या किसी भी अन्य को दोष देने की बजाय ऐसे समय में हमे अपनी ही सोच का निरीक्षण कर लेना चाहिए। निश्चित ही, हमारी सोच ही हमारे व्यवहार व वातावरण को प्रभावित करती हैं। हमारी सोच में कुछ अशुद्धियाँ है, जिन्हें जानकर दूर कर लेना हम सबके लिए जरूरी हैं।

विश्वासघाती इंसानियत से कोसों दूर हैं

जो लोग जिददी, घमंडी, छल-प्रपंच में मशगूल, स्वार्थी, अनुदार, असंतुष्ट, अपवित्र व असम्यक विचार व व्यवहार करने में निपुण व इंसानों के दिलों को तोड़ने वाले हैं वे विश्वासघाती हैं।  सही मैने में इंसानियत से कोसों दूर हैं ऐसे लोग तो इस पृथ्वी पर भी भार स्वरूप ही हैं।

इंसान का जीवन पाकर इंसान कहलाए जाने योग्य

इस संसार में जो विनम्र, जिज्ञासु उदार हृदय, संतुष्टमना, पवित्र एंव संतुलित व्यवहार करने वाले तथा सदा मानव-मानव को जोड़ने वाले और एकता बढ़ाने वाले लोग हैं, वे ही वास्तव में धन्य हैं। इंसान का जीवन पाकर इंसान कहलाए जाने योग्य हैं। ऐसे ही लोग प्रभु के राज्य में प्रवेश पा सकेंगे।

अच्छा लगता है जब कोई तारीफ करता है।

अच्छा लगता है जब कोई तारीफ करता है। आसान नहीं होता ऐसे लोगों से दूर होना या फिर उन्हें गलत ठहराना, जो सही-गलत हर बात पर आपकी तारीफ करते हैं। लेकिन चाणक्य कहते हैं, चापलूसी करने वाले से सदा बचे रहें। ऐसा व्यक्ति बड़ा भारी चोर होता है। वह आपको मूर्ख बनाकर आपका समय भी चुराता है और बुद्धि भी।

अजीब हैं हम,जिसे देखते हैं उसे झूठ मान लेते हैं।

अजीब हैं हम,जिसे देखते हैं उसे झूठ मान लेते हैं। जो नहीं दिख रहा वह सच बन जाता है। दुनिया की चालाकी पर इतना यकीन है कि हम न किसी को प्यार करते हैं और न किसी पर विश्वास। मदर टेरेसा कहती हैं,यदि लोगों को समझने में ही समय व्यर्थ कर दिया तो आपके पास इतना समय नहीं बचेगा कि आप उन्हें प्रेम कर सकें।

मन का निर्विषय होना ही मुक्ति है।

मन का निर्विषय होना ही मुक्ति है। अतः इस भवबंधन से मुक्ति होने की इच्छा रखने वाले मनुष्यों को अपना मन निरासक्त अर्थात विषयों से मुक्त रखना चाहिए ।  

हम दूषित कर्मों से बचे

संदेश एक ही है – हम दूषित कर्मों से बचे, अपने ज्ञान को माया द्वारा अपहृत किए जाने से रोके तथा सद्बुद्धि के मार्ग पर चलें। प्रभु पहले ही कह चुके हैं कि यह माया बड़ी दुस्तर है। प्रभु का सतत स्मरण, गायत्री मंत्र का भावपूर्वक किया गया जप, सत्संग, स्वाध्याय ही हमें आसुरी स्वभाव कि ओर ले जाने से, दुर्बुद्धि के मार्ग पर जाने से रोक सकते हैं।

जीवन पथ पर आगे बढ़ने के लिये हमें स्वस्थ, सबल, रचनात्मक मनोभूमि की अत्यंत आवश्यकता है।

जीवन पथ पर आगे बढ़ने के लिये हमें स्वस्थ, सबल, रचनात्मक मनोभूमि की अत्यंत आवश्यकता है। इसके बिना हम एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकेंगे प्रत्युत हमारा असंतुलित मन ही हमारे विनाश का कारण बन जायेगा। इसके लिये आत्म निरीक्षण द्वारा मनोविकारों को समझा जाय। अपनी मनोभूमि का पूरा-पूरा निराकरण किया जाय। जो भी नकारात्मक विचार हो उनसे पूर्णतया मुक्त होने का प्रयत्न किया जाय। स्मरण रहे आत्म-निरीक्षण के प्रक्रिया इतनी गंभीर भी न हो जिससे जीवन के अन्य अंगो की उपेक्षा होने लगे। केवल अपने बारे में ही सोचते रहना, अपने व्यक्तित्व में घुसकर ही ताना-बाना बुनते रहना भी आगे चलकर मानसिक दोष बन जाते है। आवश्यकता इस बात की अपनी मनोविकृति के बारे मे गंभीरता से सोचा जाय और फिर उसे सुधारने के लिये तत्परतापूर्वक लग जाया जाय।