जीवन में सफलता पाने के प्रमुख सात साधन

जीवन में सफलता पाने के जितने साधन बतलाये गये हैं, उनमें विद्वानों ने इन सात बन्धनों को प्रमुख स्थान दिया है-परिश्रम एवं पुरुषार्थ, आत्म विश्वास एवं आत्मनिर्भरता, जिज्ञासा एवं लगन. त्याग एवं बलिदान, स्नेह एवं सहानुभूति, साहस एवं निर्भ.ता, प्रसन्नता एवं मानसिक संतुलन। जो मनुष्य अपने में इन सात साधनों का समावेश कर लेता है, वह किसी भी स्थिति का क्यों न हो, अपनी वांछित सफलता का अवश्य वरण कर लेता है।

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कर्मकांड के क्रिया-कृत्यों को ही सब कुछ मान बैठना या उन्हें एकदम निरर्थकमान लें, दोनों ही हानिकारक हैं |

कर्मकांड के क्रिया-कृत्यों को ही सब कुछ मान बैठना या उन्हें एकदम निरर्थकमान लें, दोनों ही हानिकारक हैं | उनकी सीमा भी समझें, लेकिन महत्व भी न भूलें | संक्षिप्त करें ; पर श्रद्धासिक्त मनोभूमि के साथ ही करें, तभी वह प्रभावशाली बनेगा और उसका उद्येश्य पूरा होगा |

 

हमें कोई गुमराह न कर सके, इतना हममें विवेक हो

हमें कोई गुमराह न कर सके, इतना हममें विवेक हो, कोई हम पर दबाव न डाल सके, इतना हममें आत्मबल हो, हम अपनी कृति को प्रामाणिक बना सके, इतना हममें आत्मविश्वास हो। हम अन्याय के विरुद्ध लड़ सकें इतना हममें शौर्य हो। हम अपने आदर्शमय पथ पर अडिग हो कर समुन्नत रहें, ऐसी हमारी साधना हो, पलायन नहीं संघर्ष, बुज़दिली नहीं साहस, अकर्मण्यता नहीं शौर्य ही मनुष्य का गौरवपूर्ण परिभाषा है।

 

डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम एक वैज्ञानिक, राष्ट्रपति और शिक्षक की भूमिका में उन्होने सदैव मातृभूमि की सेवा की।

डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम एक ऐसे व्यक्तित्व के स्वामी थे जो सभी के अनुकरणीय है। कठिन परिश्रम, आत्म विश्वास, दृढ़ संकल्प ये उनके मुख्य मूल मंत्र रहे। एक वैज्ञानिक, राष्ट्रपति और शिक्षक की भूमिका में उन्होने सदैव मातृभूमि की सेवा की। ऐसे महापुरुष आज हमे बीच नहीं रहे इसका हम सबको दुख है । ऐसे महान व्यक्तित्व को सत सत नमन ।

व्यंग्य – विनोद तभी तक अच्छा है,जब तक वह अपनी मर्यादा में रहे

व्यंग्य – विनोद तभी तक अच्छा है,जब तक वह अपनी मर्यादा में रहे और किसी के स्वाभिमान अथवा गौरव पर ठेस न पंहुचाए और दोनों पक्ष समान रूप से प्रसन्न होते रहें , अन्यथा यह भी एक अपमान का ही रूप है जिससे विनाश उत्पन्न होता है।

मरण एक उच्चकोटि का अध्यापक ,धर्म एवं दार्शनिक है

मरण एक उच्चकोटि का अध्यापक ,धर्म एवं दार्शनिक है , जो बताता है की निर्धारित कर्तव्यों का परिपालन करते हुए सुखपूर्वक रहो और साथियों को रहने दो । जो जीवन के स्वरूप ,उद्देश्य और उपयोग को समझता और पालता है, उसके लिए मृत्यु न तो कष्टकारक होती है और न भयप्रद ।

ईश्वर उपासना आत्मा की वैसी ही आवश्यकता है , जैसी शरीर को प्राण की ।

ईश्वर उपासना आत्मा की वैसी ही आवश्यकता है , जैसी शरीर को प्राण की । भगवान की उपासना का अर्थ है -भगवान के पास बैठना । पारस से छुए बिना लोहा सोना कैसे बने ? ईश्वर के समीप पाहुचे बिना आत्मा की प्यास बुझती नही है । उपासना की प्रक्रिया आत्मा को परमात्मा की और उन्मुख करती है ।