जिनके मन में मानवता को ऊँचा उठाने की भावना उठने लगी हो ऐसे व्यक्ति संसार के देवताओं में गिने जाने योग्य होते है।

जिनके मन में अपनी शक्ति-सामर्थ्य का एक अंश पीड़ित मानवता को ऊँचा उठाने में लगाने की भावना उठने लगी हो, उन्हीं के बारे में ऐसा सोचा जा सकता है कि मानवीय श्रेष्ठता की एक किरण उनके भीतर जगमगाई हैं,ऐसे ही प्रकाश-पुंज व्यक्ति संसार के देवताओं में गिने जाने योग्य होते है। उन्हीं के व्यक्तित्व का प्रकाश मानव जाति के लिए मार्गदर्शक बनता है।

अपने परिवार में से अब ऐसे ही व्यक्ति ढूँढने हैं,

हमें अपने परिवार में से अब ऐसे ही व्यक्ति ढूँढने हैं, जिन्होंने अध्यात्म का वास्तविक स्वरूप समझ लिया हो और जीवन की सार्थकता के लिए चुकाए जाने वाले मूल्य के वारे में जिन्होंने अपने भीतर आवश्यकता साहस एकत्रित करना आरंभ कर दिया हो। हम अपना उतराधिकार उन्हें ही सौंपेंगे ।

भावनाओं का दरिद्र व्यक्ति ईश्वर के दरबार में एक कोढ़ी-कंगले का रूप बनाकर ही पहुँचेगा।

भावनाओं का दरिद्र व्यक्ति ईश्वर के दरबार में एक कोढ़ी-कंगले का रूप बनाकर ही पहुँचेगा। उसे वहाँ क्या कोई मान मिलेगा? भक्ति का भूखा-भावना का लोभी भगवान, केवल भक्त की उदात भावनाओं को परखता है और उन्हीं से रीझता हैं। माला और चंदन, दर्शन और स्नान उसकी भक्ति के चिन्ह नहीं, दृदय की विशालता और अंतः करण की करुणा ही किसी व्यक्ति को ईश्वर के राज्य में प्रवेश पाने का अधिकारी बनाती हैं।

निष्ठुर व्यक्ति को नर-पशु ही गिना जाएगा

निष्ठुर व्यक्ति,जिसे अपनी खुदगर्जी के अतिरिक्त दूसरी बात सूझती ही नहीं,जो अपनी सुख-सुविधा से आगे की बात सोच ही नहीं सकता, ऐसा अभागा व्यक्ति निकृष्ट कोटी के जीव-जंतुओं की मनोभूमि का होने के कारण तात्विक दृष्टि से नर-पशु ही गिना जाएगा। ऐसे नर-पशु कितना भजन करते हैं कितना ब्रहाचर्या से रहते हैं इसका कोई विशेष महत्व नहीं रह जाता।

महामानवों में एक अतिरिक्त गुण होता हैं और वह है परमार्थ।

महामानवों में एक अतिरिक्त गुण होता हैं और वह है परमार्थ। दूसरों को दुखी या अधः पतित देखकर जिसकी करुणा विचलित हो उठती हैं, जिसे औरों की पीड़ा अपनी पीड़ा की तरह कष्टकर लगती हैं, जिसे दूसरों के सुख में अपने सुख की आनंदमयी अनुभूति होती हैं, वस्तुतः वहीं महमानव ,देवता ऋषि , संत, ब्राहण अथवा ईश्वरभक्त हैं।

भाव-भक्ति की दशा में हम परमेश्वर के सर्वाधिक निकट होते हैं।

भाव-भक्ति की दशा में हम परमेश्वर के सर्वाधिक निकट होते हैं। भगवान की भी एक ही प्यास हैं- निश्छल,निष्कपट प्रेमपूर्ण भावनाएँ,जो केवल उन्हीं को समर्पित हों, जिनमें किसी भी तरह की कलुषता न हो। इसी कारण भक्ति को पैदा नहीं किया जा सकता, वह स्वंय प्रकट होती हैं अंतःकरण के शुद्ध होने पर । भक्ति ही वह चरण हैं, जिसके माध्यम से व्यक्ति आध्यात्मिक ज्ञान व उसकी विभूतियों से सराबोर होता चला जाता हैं।

व्यक्ति को जितना ज्ञान होगा, उतनी ही अलौकिक सामर्थ्य उसमें होगी।

व्यक्ति को जितना ज्ञान होगा, उतनी ही अलौकिक सामर्थ्य उसमें होगी। वास्तव में ज्ञान पुस्तकों को पढ़ने से नहीं, बल्कि अनुभव से आता हैं। जो जितना अनुभवी होता हैं, उसी के अनुरूप उसे ज्ञानी समझा जाता हैं अर्थात जितना अनुभव का संसार हैं, उतना ही ज्ञान है, परिष्कार के अनुरूप ज्ञान बढ़ता हैं और ज्ञान के अनुसार शक्ति।

ध्यान का नियमित अभ्यास बेहतर अंतरज्ञान की ओर ले जाता है।

ध्यान न कर सकने के बड़े कारणों में से एक यह है कि लोगों के पास पर्याप्त समय नहीं है। लेकिन अगर वे ध्यान करना आरंभ करते हैं तो पाते हैं की उनके पास अधिक समय है। इसकी वजह है की वे केंद्रित हो सकते हैं और अधिक कार्य कर सकते हैं। ध्यान का नियमित अभ्यास बेहतर अंतरज्ञान की ओर ले जाता है। यह मन को तीक्ष्ण बनाता है एंव विश्राम द्वारा मन को विकसित करता है।

मन में जो भव्य विचार या शुभ योजना उत्पन्न हो, उसे तुरंत कार्यरूप मे परिणत कर डालिए

मन में जो भव्य विचार या शुभ योजना उत्पन्न हो, उसे तुरंत कार्यरूप मे परिणत कर डालिए, अन्यथा वह जिस तेजी से मन में आया, वैसे ही एकाएक गायब हो जाएगा और आप उस सुअवसर का लाभ न उठा सेकेंगे। वास्तव में, समस्या यह नहीं की हमारे पास उपयोगी विचार या सुंदर योजनाएं नहीं हैं। योजनाएं तो हम बहुत बनाते हैं,अपने बनाए उतम से उतम विचारों से परसन्न भी हम बहुत होते हैं, किंतु उन पर हम कार्य नहीं करते है।

चीजें बदलती है, बड़ी तेजी से बदलती हैं।

आज जो पास है, हो सकता है कल न हो । चीजें बदलती है, बड़ी तेजी से बदलती हैं। लोग और घटनाएं दोनों आते-जाते रहते है। कई बार किसी एक क्षण में ही ज़िंदगी बदल चुकी होती है। ध्यान रखें, अच्छी या बुरी कैसी ही स्थिति क्यों न हो,बदलेगी जरूर। इसलिए जब जीवन में खुशी हो तो उसे एंज्वाय करें। खुशियां उन्हीं के पास आती हैं, जो मौजूद चीजों की खुशी मनाना जानते है।