मनुष्य ने हमेशा प्रकृति से लिया ही है।

मनुष्य ने हमेशा प्रकृति से लिया ही है। प्रकृति भी उदारतापूर्वक मनुष्य की हर आवश्यकता की पूर्ति करती रही है, परंतु जब से मनुष्य ने अपने भोग-विलास के लिए प्राकृतिक संपदाओं के निर्बाध उपयोग के साथ-साथ उसे नष्ट करने का भी सिलसिला शुरू किया,तभी से अपने विनाश को भी आमंत्रित कर लिया ।

भावना से ही पाप-पुण्य का नाप होता है।

हम जिस इच्छा से, जिस भावना से जो काम करते हैं, उस इच्छा या भावना से ही पाप-पुण्य का नाप होता है। भौतिक वस्तुओं की तौल-नाप बाहरी दुनिया में होती है। भीतरी दुनिया में यह नाप-तौल नहीं चलती, वहाँ तो इच्छा और भावना की नाप-तौल है। इसी के मुताबिक पाप-पुण्य का जमा-ख़रच किया जाता है।

शरीर और मन पर अपना अधिकार है

दूसरों पर न सही अपने शरीर और मन पर तो अपना अधिकार है ही और उस अधिकार का उपयोग करने में किसी प्रकार का कोई व्यवधान व हस्तक्षेप कहीं से भी नहीं हो सकता । अभीष्ट दिशा में निर्भयता एंव निश्चिंतता के साथ बढ़ा जा सकता है। मात्र प्रचंड संक्ल्पशक्ति चाहिए।

मानवी मस्तिष्क एक यंत्र की तरह कार्य करता है।

वस्तुतः मानवी मस्तिष्क एक यंत्र की तरह कार्य करता है। उसमें उत्पन्न हुई कोई भी योजना कार्य रूप में परिणत होंना चाहती हैं। अतः आरंभ से ही इस संबंध में सतर्कता बरतनी चाहिए की मस्तिष्क में उत्कृष्ट विचारों का ही उदभव हो और निषेधात्मक विचार न आने पाएँ।

हींन भावना का शारीरिक एंव मानसिक दुर्बलता से घनिष्ठ संबंध है।

हींन भावना का शारीरिक एंव मानसिक दुर्बलता से घनिष्ठ संबंध है। इससे छुटकारा पाने के लिए आवश्यक है की जीवन की रीति- नीति बदली जाए। अपना स्वाभिमान बनाए रखते हुए दूसरों के गुणों की प्रशंसा की जाए। ऐसे व्यक्ति एक ओर तो किसी की भर्त्सना करते हैं तो दूसरी ओर वह स्वंय की समीक्षा भी करते जाते हैं।

उदासीनता मानवी मन की एक बहुत बड़ी दुर्बलता मानी जाती ।

उदासीनता मानवी मन की एक बहुत बड़ी दुर्बलता मानी जाती । प्रगति-पथ का यह बहुत बड़ा रोड़ा है,जिसे मनुष्य स्वंय अपने चिंतन-मनन से उत्पन्न करता है। ऐसे व्यक्ति उन कारणों का पता लगाकर प्रयास करने पर स्वयमेव इस स्थिति से छुटकारा पा सकते हैं।विचारों को विचारों से काटा जाता हैं।

यदि मनुष्य यह अनुभव करता है की उसका जीवन निरर्थक है

यदि मनुष्य यह अनुभव करता है की उसका जीवन निरर्थक है, उसका मन और शरीर कभी स्वस्थ नहीं रहेगा। सार्थकता ही अनुभूति न होने पर मनुष्य जिंदगी को लाश की तरह ढोता है और उस नीरस-निरानंद स्थिति में सचमुच ही जीवन बहुत बोझिल लगता है।

दोषपूर्ण चिंतन और विकृत मनः स्थिति के कारण कष्ट उत्पन्न होता है

व्यक्ति अपने दोषपूर्ण चिंतन और विकृत मनः स्थिति के कारण इसे स्वंय उत्पन्न करता है, क्योंकि अंतर्मन की आत्महीनता और अशुभ चिंतन से ही इसका स्वरूप बनता हैं। इससे न केवल जीवनीशक्ति का क्षरण होता है, वरन प्रतिभा एंव सृजनात्मक गुणों के विकास का मार्ग भी अवरूद्ध हो जाता है और व्यक्तित्व हेय बनकर रह जाता है।

परिस्थितियों मनुष्य के अपने हाथ की बात है।

परिस्थितियों मनुष्य के अपने हाथ की बात है। सदा जीतने वाला पुरुषार्थी वह जो सामर्थ्य के अनुसार परिस्थितियों को बदलता देता है, किन्तु यदि वे बदलती नहीं तो स्वंय अपने आपको उन्हीं के अनुसार बदल लेता है। उन्नति की मूल वस्तु महत्वाकांक्षा है।

जो उच्च विचारों का वरण करना चाहते हैं ।

जो उच्च विचारों का वरण करना चाहते हैं । श्रेय पथ पर चलना चाहते हैं,उन्हें सादगी अनिवार्यत: अपनानी पड़ेगी। अन्यथा लिप्सा – ललसाओं के अधड़ में उच्च विचार मात्र कल्पनाभर बनें रहेंगे तथा चरितार्थ होने की दिशा में दो कदम भी आगे बढ़ न सकेंगे।