अपने आप को ऊपर उठाना और गिराना मनुष्य के अपने हाथ की बात है।

अपने आप को ऊपर उठाना और गिराना मनुष्य के अपने हाथ की बात है। साहस, उत्साह, पराक्रम और विश्वास के आधार पर मनुष्य ऊँचा उठता है। यह उसका उत्कर्षजन्य प्रयास है। साधन और अवसर सामने होने पर भी उसे अधोगामी मार्ग ही पकड़ना पड़ता है।

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प्रतिभा तेजस्विता को कहते हैं।

प्रतिभा तेजस्विता को कहते हैं। यह चेहरे की चमक या चतुरता नहीं, वरन मनोबल पर आधारित ऊर्जा है। तेजस्विता तपश्चर्या की उपलब्धि है, जो निजी जीवन से संयम-साधना और सामाजिक जीवन में परमार्थपरायणता के फलस्वरूप उद्भूत होती है। संयम अर्थात अनुशासन का, आत्मनियंत्रण का कठोरतापूर्वक परिपालन। जो इतना कर सकें, उन्हीं से परमार्थ साधता है।

आध्यात्मिकता आज के युवा जीवन की अवश्यकता है ।

आध्यात्मिकता आज के युवा जीवन की अवश्यकता है । यह सार्थक यौवन की राह है । इसे किसी मज़हब अथवा धर्म से जोरने की जरूरत नहीं है । यह तो जीवन का वह सार्वभौम संदेश है ,जिसे उपनिषद के तत्वज्ञानी महामानव देते आए हैं ।मनुष्य आध्यात्म के बिना, अपनी औकात को पहचान नहीं पता है । उसे ये पता नहीं चलता कि वह इस दुनिया की महान शक्ति है ।

स्वस्थ मन के लक्षण।

मन वह जिसमे अच्छे विचार आए, ऊचे आदर्श की कल्पना हो जो जीवन को उचित मार्ग पर चलने की दृढ़ता प्रदान करे, जो शरीर में उत्साह की तरंगे बढ़ाए, जिसमे ईर्ष्या, द्वेष, लोभ अन्याय का मैल ना हो। यह है स्वस्थ मन के लक्षण।

संकोच प्रगति में बाधा है

किसी काम के लिए आगे आना कोई बुरी बात नहीं, अच्छी बात है। यश कमाने से या अधिक कार्य करने का अवसर पाने के उद्देश्य से, दोनों ही प्रकरणों में आगे आना बुरा नहीं। यदि अन्य लोग संकोचवश पीछे ही बने रहे, तो फिर उपयुक्त व्यक्तियों को उपयुक्त काम सौंपा ही कैसे जा सकेगा ? किसी को पता ही नहीं रहेगा की किस में काम के प्रति उत्साह है, किस में उसे पूरा कर सकने योग्य योग्यता है, तो काम की प्रगति में बाधा ही आएगी। इसलिए काम ठीक से हो सके, हम अधिक कार्य कर सके, आगे आकर कार्य में हिस्सा बटा ले, यह भावना अच्छी भी है और उपयोगी भी।

दुख का मुख्य कारण भय है।

दुख का मुख्य कारण भय है। निर्भीकता के बल से मनुष्य पृथ्वी पर ही श्वर्ग के समापन सुख भोग सकता है । यदि तुम निर्भयतापूर्वक कार्य करोगे तो तुम्हें निश्चित ही सफलता प्राप्त होगी, लेकिन यदि तुम डर गए तो तुम शक्तिहीन होकर दुःख के भागी बनोगे।

प्रेम कुछ पाने की इच्छा से नहीं किया जाता बल्की देने की भावना से किया जाता है ।

प्रेम कुछ पाने की इच्छा से नहीं किया जाता बल्की देने की भावना से किया जाता है । प्रेम दान का नियम है जो निरंतर देता रहता है ,यदि लेता है तो केवल प्रेम ही । प्रेम की पूर्ति प्रेम से होती है । प्रेम साधना का दूसरा नियम है । सच्चा प्रेम वह है जो घर बाहर , मंदिर , मस्जिद समस्त जाति वर्ण में एक रस, एक समान वाप्त होकर हमारी नस-नस मे समा जाय और जीवन का अंग बन जाय ।