दीप यज्ञ सभी वर्गों के लिए है

दीप यज्ञों में कम समय, कम श्रम तथा कम साधनों से भी बड़ी संख्या में व्यक्ति यज्ञीय जीवन पद्धति से जुड़ पते हैं | दीपक-अगरबत्ती सभी धार्मिक स्थलों में प्रज्वलित होते हैं, इसलिए उस आधार पर सभी वर्गों के लोग बिना किसी झिझक के दीपयज्ञों में सम्मिलित होते हैं |

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द्रुतगामी वाहनों का कुप्रभाव

द्रुतगामी वाहनों ने जहाँ आज दुनिया को बहुत छोटी बना दिया है, वहाँ इसका एक बहुत बड़ा प्रभाव मानव की मानसिक शांति, पारिवारिक- दाम्पत्य -जीवन एवं सामाजिकता वाले पक्ष पर भी पड़ा है | विज्ञान ने वरदान के साथ प्रदुषण को बढ़ाकर ओजोन की परत को पतला कर परा बैंगनी किरणों तथा अन्यान्य कैंसर को जन्म देने वाले घातक रोगाणुओं की पृथ्वी पर फेंकने वाला सूर्य पर इन दिनों कुपित है |

सुगम श्लोकों का प्रयोग

आवश्यकता के अनुसार विवेकपूर्वक सुगम श्लोकों का प्रयोग भी उचित स्थानों पर किया गया है | प्रयुक्त श्लोक भी बहुत प्रचलित तथा सुगम हैं, इसीलिए संस्कृत न जानने वाले सुशिक्षित परिजन भी थोड़े से अभ्यास से कर्मकाण्ड सम्पन्न करने में सफल होगें

सफलता पाने के सात प्रमुख बन्धन

जीवन में सफलता पाने के जितने साधन बतलाये गये हैं, उनमें विद्वानों ने इन सात बन्धनों को प्रमुख स्थान दिया है-परिश्रम एवं पुरुषार्थ, आत्म विश्वास एवं आत्मनिर्भरता, जिज्ञासा एवं लगन. त्याग एवं बलिदान, स्नेह एवं सहानुभूति, साहस एवं निर्भता, प्रसन्नता एवं मानसिक संतुलन। जो मनुष्य अपने में इन सात साधनों का समावेश कर लेता है, वह किसी भी स्थिति का क्यों न हो, अपनी वांछित सफलता का अवश्य वरण कर लेता है।

धनदान तो एक प्रतीक मात्र है।

धनदान तो एक प्रतीक मात्र है। उसका तो दुरुपयोग भी हो सकता है, प्रभाव विपरीत भी पड़ सकता है। वास्तविक दान प्रतिभा का है, धन साधन उसी से उपजते हैं। प्रतिभादान-समयदान से ही संभव है। यह ईश्वर प्रदत्त सम्पदा सबके पास समान रूप से विद्यमान है।

प्रतिभा की निजी जीवन के विकास में निरंतर आवश्यकता पड़ती है

प्रतिभा की निजी जीवन के विकास में निरंतर आवश्यकता पड़ती है और अवरोधों को निरस्त करने में भी। जो आगे बढ़े –ऊँचे उठे हैं, उन्हें यह दोनों ही सरंजाम जुटाने पड़े। उत्कर्ष की सूझ-बूझ और कठिनाइयों से लड़ सकने की हिम्मत, इन दोनों के बिना उन्नतिशील जीवन जी सकना संभव ही नहीं होता। फिर सामुदायिक सार्वजनिक क्षेत्र में सुव्यवस्था बनाने के लिए और भी अधिक प्रखरता चाहिए। यह विशाल क्षेत्र आवश्यकताओं और गुत्थियों की दृष्टि से तो और भी बढ़ा-चढ़ा होता है।

आत्मबल-संकल्पबल

भगवत् सत्ता का निकटतम और सुनिश्चित स्थान एक ही है, अंतराल में विद्यमान प्राणाग्नि। उसी को जानने-उभारने से वह सब कुछ मिल सकता है, जिसे करने की वसता मनुष्य के पास है। प्राणवान्
प्रतिभासंपन्नों में उस प्राणाग्नि का अनुपात सामान्यों से अधिक
होता है। उसी को आत्मबल-संकल्पबल
भी कहा गया है।