मनुष्य जीवन स्वतः एक बड़ा चमत्कार ह

मनुष्य जीवन स्वतः एक बड़ा चमत्कार है, प्रकृति में इतना बड़ा चमत्कार दूसरा नहीं, फिर भी आश्चर्य है कि लोग इतनी महत्वपूर्ण उपलब्धि को भौतिक सुखों में
गँवा देते हैं।

Advertisements

प्राचीनकाल में सुखद जीवन का सार

प्राचीनकाल में सुखद जीवन का सार
यही था कि मानव प्रकृति के साथ आत्मिक सबंध स्थापित कर बहुत सीधा-सदा जीवन व्यतीत करता था। वह सिर्फ
अपनी अनिवार्य आवश्यकताओं के किए
प्रकृति का उपयोग करता था और इसके लिए वह प्रकृति के प्रति कृतज्ञ होता था। उसकी इस भावना के फलस्वरूप उसके और प्रकृति के बीच आंतरिक संबंध
कायम था।

वैज्ञानिक उपलब्धियों की चकाचौंध में अपने मूल तत्व एंव संस्कृति को भूल चुके हैं।

अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए हम धरती की जीवनदायी व्यवस्था में व्यवधान उपस्थित करने पर भी उतारू हो गए हैं। अपने भौतिक सुख-सुविधाओं के लिए उन्हीं प्राकृतिक मनुष्य ने हमेशा प्रकृति से लिया ही है। प्रकृति भी उदारतापूर्वक मनुष्य की हर आवश्यकता की पूर्ति करती रही है, परंतु जब से मनुष्य ने अपने संसाधनों को नष्ट कर रहे हैं, जो प्रकृति ने स्वचालित संतुलन व्यवस्था के रूप में हमें दिए है। इन सब का कारण यही है कि वस्तुतः आज हम वैज्ञानिक उपलब्धियों की चकाचौंध में अपने मूल तत्व एंव संस्कृति को भूल चुके हैं।

भावना से ही पाप-पुण्य का नाप होता है।

हम जिस इच्छा से, जिस भावना से जो काम करते हैं, उस इच्छा या भावना से ही पाप-पुण्य का नाप होता है। भौतिक वस्तुओं की तौल-नाप बाहरी दुनिया में होती है। भीतरी दुनिया में यह नाप-तौल नहीं चलती, वहाँ तो इच्छा और भावना की नाप-तौल है। इसी के मुताबिक पाप-पुण्य का जमा-ख़रच किया जाता है।

प्रचंड संक्ल्पशक्ति चाहिए

दूसरों पर न सही अपने शरीर और मन पर तो अपना अधिकार है ही और उस अधिकार का उपयोग करने में किसी प्रकार का कोई व्यवधान व हस्तक्षेप कहीं से भी नहीं हो सकता । अभीष्ट दिशा में निर्भयता एंव निश्चिंतता के साथ बढ़ा जा सकता है। मात्र प्रचंड संक्ल्पशक्ति चाहिए

हमे केवल कर्म पर अधिकार है ।

हमेशा इस बात ध्यान रखना चाहिए कि हमारा केवल कर्म पर अधिकार है, जो हमें मिल रहा है, उस पर नहीं। हमारे जैसे पूर्व कर्म होंगे , उनका ही परिणाम हमें भुगतना पड़ता है। अतः पूरे विश्वास के साथ सत्कर्म करना चाहिए ।

शिष्टाचार का महत्व…

सच्चा सम्मान प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को शिष्टाचार के कुछ नियमों का पालन अवश्य करना चाहिए, इसके बाद भी  यदि अपमान मिलता है, तो उसे भगवान की कृपा-प्रसाद समझकर ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि उससे व्यक्ति का कोई अहित नहीं होगा, बल्कि उस में भी कोई न कोई हित छिपा होगा।