निष्काम कर्म एंव भगवत स्मरण …

निर्मलता बढ़ाने के दो ही उपाय हैं- निष्काम कर्म एंव भगवत स्मरण । जो भी कर्म करें, उनका फल भगवान को अर्पित करते चलें। यह न बने तो सतत उनका सुमिरन करें। स्मरण-उपासना द्वारा भगवान के गुणों का चिंतन करते-करते वैसा ही बन जाना ।

युवाओं का एक वर्ग ऐसा भी है, जो आधुनिकता के नाम पर पश्चिमी संस्कृति और सभ्यता से इतना तदाकार हो चुका है कि…..

युवाओं का एक वर्ग ऐसा भी है, जो आधुनिकता के नाम पर पश्चिमी संस्कृति और सभ्यता से इतना तदाकार हो चुका है कि उसके सामने अपनी संस्कृति महज एक संग्रहालय कि वस्तु है, जिसे देखा तो जा सकता है, अपनाया नहीं जा सकता, क्योंकि इनके लिए एकमात्र लक्ष्य है- किसी भी तरीके से धन अर्जन । संपदा ही आज सामाजिक मूलयों का प्रतीक और प्रतिष्ठा का आधार बन बैठी है।

निर्मलता बढ़ाने के…

निर्मलता बढ़ाने के दो ही उपाय हैं- निष्काम कर्म एंव भगवत स्मरण । जो भी कर्म करें, उनका फल भगवान को अर्पित करते चलें। यह न बने तो सतत उनका सुमिरन करें। स्मरण-उपासना द्वारा भगवान के गुणों का चिंतन करते-करते वैसा ही बन जाना ।

परमात्मा स्तर तक पहुंचना योग–साधना द्वारा ही संभव है।

योग के बिना आत्मा को परमात्मा से जोड़ा नहीं जा सकता और जब तक ईश्वरीय समर्थन-सहयोग प्राप्त ण हो तब तक मानवों की , ऋषि भूमिका में प्रवेश करना कठिन पड़ता है। आत्मा को, देवात्मा बनाते हुए उसे परमात्मा स्तर तक पहुंचा दें, योग–साधना द्वारा ही संभव है।

आसुरी स्वभाव वाले भगवान को नहीं मानते एंव न ही उनका भजन करते हैं।

भगवान कहते हैं की जिन्हें माया अपने जाल में फास लेती है या जो जान-बूझकर उसके जाल में फँस जाते है, ऐसे व्यक्ति विवेक खो बैठते हैं एंव नरधाम जैस आचरण करने लगते हैं, तब वे आसुरी स्वभाव वाले, भगवान को नहीं मानते एंव न ही उनका भजन करते हैं।

जो अनजान है और अपने को जानकार मानता है, उससे बचना चाहिए….

जो अनजान है और अपने को जानकार मानता है, उससे बचना चाहिए। जो अनजान है और अपने अल्पज्ञता से परिचित है, उसे सिखाना । जो जानता तो है, पर अपने ज्ञान के बारे में शंकालु है उसे जगाओ और जो जानता है, पर साथ अपनी जानकारी के प्रति आस्थावान है,वह बुद्धिमान है, ऐसे ही व्यक्ति के पीछे चलाना चाहिए ।

जो अनजान है और ….

जो अनजान है और अपने को जानकार मानता है, उससे बाचना चाहिए । जो अनजान है और अपने अल्पज्ञता से परिचित है, उसे सिखाना । जो जानता तो है, पर अपने ज्ञान के बारे में शंकालु है उसे जगाओ और जो जानता है, पर साथ अपनी जानकारी के प्रति आस्थावान है,वह बुद्धिमान है, ऐसे ही व्यक्ति के पीछे चलाना चाहिए ।

निठल्ले व्यक्ति किसी समय देश के लिए चिंता, लज्जा और कलंक कि बात होगी….

निठल्ले व्यक्ति लाल, पीले कपड़े पहनकर अपनी हेय गतिविधियों से समाज कि जो कुसेवा करते है। उससे केवल हानी ही हानी हाथ लगाई है। भिक्षा-व्यवसाय अपने देश में जिस ढंग से पनपा है, वह किसी समय देश के लिए चिंता, लज्जा और कलंक कि बात होगी। साधू-संतो ने प्राचीनकाल कि तरह लोकोपयोगी जीवन जिया होता अरु उनकी गतिविधियों सृजनात्मक रही होती तो अब 56 लाख से बढ़कर 60 लाख तक जा पहुँचे इस वर्ग का भार भी उठाया जा सकता था।

आधुनिकता के नाम पर पश्चिमी संस्कृति और सभ्यता का अंधानुकरण

युवाओं का एक वर्ग ऐसा भी है, जो आधुनिकता के नाम पर पश्चिमी संस्कृति और सभ्यता से इतना तदाकार हो चुका है कि उसके सामने अपनी संस्कृति महज एक संग्रहालय कि वस्तु है, जिसे देखा तो जा सकता है, अपनाया नहीं जा सकता, क्योंकि इनके लिए एकमात्र लक्ष्य है- किसी भी तरीके से धन अर्जन । संपदा ही आज सामाजिक मूलयों का प्रतीक और प्रतिष्ठा का आधार बन बैठी है।

गायत्री उपासना के लिए सबसे आवश्यक एंव महत्वपूर्ण तत्व….

गायत्री उपासना के लिए सबसे आवश्यक एंव महत्वपूर्ण तत्व है- साधक की भक्ति भावना । इसके बिना उपासना के सारे कृत्य अधूरे एंव अपूर्ण सिद्ध होते हैं। उपासना का वह लाभ नहीं मिल पाता जो की शास्त्रों में वर्णित है। इष्ट के साथ तादात्म्य की व्याकुलता जितनी अधिक होगी। साधक को उतनी ही आधी सफलता मिलेगी। समर्पण का, एकत्व का भाव स्थापित करना होता है। इसे ही भक्तियोग कहा गया है।