गंगा किनारे गायत्री मंत्र की साधना करने से अनगिनत लाभ मिलते हैं।

गंगा किनारे गायत्री मंत्र की साधना करने से अनगिनत लाभ मिलते हैं। गंगा के किनारे अन्य साधना, जैसे महामृत्युंजय का जप एंव रुद्राभिषेक आदि का भी अत्यंत महत्व है। गंगा पतितपावनी है। यह पापों का प्रक्षालन करती है। गायत्री हमारे अंतःकरण को पवित्र करती है। गायत्री हमें प्राण प्रदान करती है और गंगा पवित्रता। पवित्रता पाए बिना प्राणों का संवर्द्धन एंव गायत्री, दोनों का विशेष महत्व है।

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गायत्री मंत्र की साधना से आत्मा का परिष्कार होता है।

गायत्री मंत्र की साधना से आत्मा का परिष्कार होता है। गायत्री का प्रत्येक अक्षर बीजमंत्र है, इसलिए इस मंत्र की महता अधिक है। गायत्री की शक्ति को बहुगुणित करने के लिए उसमें बीजमंत्र का संपुट लगाया जाता है। इससे इसका प्रभाव व्यापक एंव गहरा होता है। इसकी साधना यदि गंगातट पर गंगाजल पीकर की जाए तो जनसामान्य भी इसकी आश्चर्यजनक ऊर्जा से ऊर्जान्वित हो सकते हैं। अंतः हमें गायत्री एंव गंगा, दोनों की अभ्यर्थना, अर्चना करनी चाहिए ।

सहानुभूति एंव क्षमाभाव से हमारे अंदर की नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है

दूसरों के प्रति सहानुभूति एंव क्षमाभाव से हमारे अंदर की नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है और भावनात्मक संतुलन बढ़ता है। अंतः हमें दूसरों को क्षमा करना चाहिए। एक वर्ष की निष्काम सेवा से हमारी भावनाओं में आने वाले काफी परिवर्तन को अनुभव किया जा सकता है।

सूर्य को जगत का आत्मा कहा जाता है।

सूर्य को जगत का आत्मा कहा जाता है। वह मनुष्य का भविष्यनिर्माता व भाग्यविधाता भी है। गायत्री महामंत्र द्वारा इसी सविताशक्ति का आह्वान,अवगाहन, दोहन व अवधारण किया जाता है और आत्मोत्कर्ष की दिशा में आगे बढ़ा जाता है। भौतिक सूर्य उसी सविताशक्ति का प्रतीक-प्रतिनिधि है।

पर्यावरण-प्रदूषण

विकास और उपभोग के नाम पर हमने जो आत्मघाती खतरे मोल लिए हैं, वे न हमें जीने दे रहे हैं और न मरने ही । एक अजीब-सी ऊहापोह की स्थिति में हम सब जी रहें है। इस खतरे ने हमारे जन-जीवन को घोर तनाव में डाल दिया है। मौसम-परिवर्तन एंव पर्यावरण-प्रदूषण ने हमारे जीवन में धीमा जहर घोल दिया है, जो धीरे-धीरे हमें मौत के मुंह में धकेलता जा रहा है।

उपासना मन के संयम हेतु परमात्मा की जाती है।

उपासना मन के संयम हेतु परमात्मा की जाती है। प्रकृति यदि व्यवस्थित हो जाए तो उपासना सधने लगती है। मन आवारा कुते की तरह न भटके, इसके लिए साधना की जाती है। उत्पन्न ऊर्जा का सकारात्मक सुनियोजित होता रहे, इसलिए समाजरूपी विराट ब्रहा की आराधना की जाती है। उपासना,साधना, आराधना की त्रिवेणी से ही हम विराट को साध पाते हैं, उनका सामीप्य पाते हैं।

पर्यावरण की समस्या

पर्यावरण की समस्या केवल सम्मेलन करने से, फंड जमा करने से हल नहीं हो सकती है, बल्कि जन-जन में जागरूकता पैदा करने से हल होगी। अर्थपवार इसी जागरूकता का प्रतीक-पर्याय है। यह हमारी मानसिकता को बदलने की बात करता है। जो भी हो, इस अभियान को व्यापक रूप से जनसमर्थन मिलना चाहिए ।