अच्छे-बुरे वातावरण से अच्छी-बुरी परिस्थितियाँ जन्म लेती हैं

इस युग के लिए आचार्य शंकर जैसे मस्तिष्क और भगवान बुद्ध जैसे हृदय की आवश्यकता है, जिसने इन दोनों को प्राप्त कर लिया वही अध्यात्मवादी है। अध्यात्म-क्षेत्र में प्रगति करने एवं महान उपलब्धियों से लाभान्वित होने के लिए दोनों का ही अवलंबन लेना होगा। अच्छे-बुरे वातावरण से अच्छी-बुरी परिस्थितियाँ जन्म लेती हैं, और वातावरण का निर्माण पूरी तरह मनुष्य के हाथ मेँ है, वह चाहे उसे स्वच्छ, स्वस्थ और सुंदर बनाकर स्वर्गीय परिस्थितियों का आनंद ले अथवा उसे विषाक्त बनाकर स्वयं अपना दम तोड़े।

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आंतरिक भाव से परमात्मा की उपासना शरणागति का मुख्य आधार है।

आंतरिक भाव से परमात्मा की उपासना शरणागति का मुख्य आधार है। ईश्वर के समीप बैठने से वैसी ही दिव्यता उपासक को भी प्राप्त होती है, साथ ही उसके पाप-संताप गलकर नष्ट होने लगते है। नित्य-निरंतर यह अभ्यास चलाने से ही जीवन मे वह शुद्धता आ पाती है, जो पूर्ण शरणागति के लिए आवश्यक होती हैं।

खुद को गलतियां करने से रोकने में अपनी पूरी ऊर्जा लगा देना सही नहीं।

भविष्य के बारे में सोचना अच्छा है, पर अनिश्चित खुशियों के लिए वर्तमान को खफा देना ठीक नहीं। यह सोच आपको अपने जीवन को बेहतर बनाने से रोकती है। जीवन में गलतियां करना सामान्य है। खुद को गलतियां करने से रोकने में अपनी पूरी ऊर्जा लगा देना सही नहीं। ऐसा करते ही आप खुद को नए रस्तों के रोमांच से वंचित कर लेते हैं। नया सीखें और आगे बढ़ें। जीवन की खुशियों के असली खजाने हार के क्षणों में ही मिलते है।

जिंदगी को सिर्फ दूसरों को खुश करने में न बिताएँ।

कहीं ऐसा तो नहीं की आप अपने मूल स्वभाव के विपरीत दूसरों को संतुष्ट करने के लिए कोई और ही ज़िंदगी जी रहे हों । जिंदगी को सिर्फ दूसरों को खुश करने में न बिताएँ। ऐसे कार्यों में समय दें, जहां आपका तन, मन और आत्मा तीनों को खुशी मिले।

जीवन से बढ़कर और कुछ नहीं।

जीवन से बढ़कर और कुछ नहीं। पैसा ,करियर, प्रतिष्ठा ये सब आनी-जानी हैं। अपने जीवन को निर्मल बनाए रखने के लिए स्वस्थ रहें, खुश रहें और आशावादी बने। इसलिए जब समय सही ना हो, तो निराशावादी लोगों से न मिले-जुलें। उनके बीच रहें, जो खुद मजबूत हों और आपको सही राह दिखाएँ।

हमें उतनी ही सफलताएँ हस्तगत होती हैं, जितनी की हम चाहते हैं।

हमें उतनी ही सफलताएँ या उपलब्धि हस्तगत होती हैं, जितनी की हम चाहते हैं। यदि अपनी क्षमताओं को पहचानकर उनका विकास किया जा सके तथा आत्म-मूल्यांकन की संजीवनी द्वारा उन्हें जीवंत बनाया जा सके तो कोई संदेह नहीं की हम में से हर कोई उस महानता को अर्जित करने की पात्रता रखता है।

जब तक मनुष्य कर्म करता है, तभी तक वह जिंदा भी है।

बेकार पड़े लोहे को जंग खा जाती है, उसी प्रकर निष्क्रिय व्यक्ति की शक्ति को उसकी निष्क्रियता ही खा जाए तो इसमे संदेह की क्या बात। जब तक मनुष्य कर्म करता है, तभी तक वह जिंदा भी है। साधन-संपन्न और शक्तिवान भी। वह तभी तक है जब तक उसके हाथ में कर्म जिंदा है।