प्रतिभा हमारे मन-भाव में रची-बसी रहती है।

मौलिकता हमारे मन-भाव में रची-बसी रहती है। जब इसे पहचानकर अभिव्यक्त कर दिया जाता है तो यह विशेषता प्रतिभा के रूप में परिचय पाती है। जैसे किसी के अंदर का चित्रकार उसे चित्रों के संसार में बरबस खींचता ले चलता है। वह कुछ भी करे, उसकी कल्पनाओं की उड़ान एंव भावों के विविध रंग उसी के चारों ओर मँडराते रहते हैं।

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मौलिक प्रतिभा से ही किसी की पहचान होती है।

मौलिक प्रतिभा से ही किसी की पहचान होती है। हमें इसी की पहचान एंव समझ विकसित करनी चाहिए तथा इसके विकास हेतु हर संभव प्रयत्न करना चाहिए। यही व्यक्तित्व की मूल धुरी है। सारा व्यक्तित्व इसी के इर्द-गिर्द घूमता,परंतु जैसे ही हम इस धुरी से हटते हैं और किन्हीं अन्य चीजों के ओर आकर्षित होते है तो हमारी मौलिकता खोने लगती है।

मनुष्य जीवन स्वतः एक बड़ा चमत्कार है

मनुष्य जीवन स्वतः एक बड़ा चमत्कार है, प्रकृति में इतना बड़ा चमत्कार दूसरा नहीं, फिर भी आश्चर्य है कि लोग इतनी महत्वपूर्ण उपलब्धि को भौतिक सुखों में गँवा देते हैं।

प्राचीनकाल में सुखद जीवन का सार

प्राचीनकाल में सुखद जीवन का सार यही था कि मानव प्रकृति के साथ आत्मिक सबंध स्थापित कर बहुत सीधा-सदा जीवन व्यतीत करता था। वह सिर्फ अपनी अनिवार्य आवश्यकताओं के किए प्रकृति का उपयोग करता था और इसके लिए वह प्रकृति के प्रति कृतज्ञ होता था। उसकी इस भावना के फलस्वरूप उसके और प्रकृति के बीच आंतरिक संबंध कायम था।

हम वैज्ञानिक उपलब्धियों की चकाचौंध में अपने मूल तत्व एंव संस्कृति को भूल चुके हैं।

अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए हम धरती की जीवनदायी व्यवस्था में व्यवधान उपस्थित करने पर भी उतारू हो गए हैं। अपने भौतिक सुख-सुविधाओं के लिए उन्हीं प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट कर रहे हैं, जो प्रकृति ने स्वचालित संतुलन व्यवस्था के रूप में हमें दिए है। इन सब का यहीकारण यही है की वस्तुतः आज हम वैज्ञानिक उपलब्धियों की चकाचौंध में अपने मूल तत्व एंव संस्कृति को भूल चुके हैं।

मनुष्य ने हमेशा प्रकृति से लिया ही है।

मनुष्य ने हमेशा प्रकृति से लिया ही है। प्रकृति भी उदारतापूर्वक मनुष्य की हर आवश्यकता की पूर्ति करती रही है, परंतु जब से मनुष्य ने अपने भोग-विलास के लिए प्राकृतिक संपदाओं के निर्बाध उपयोग के साथ-साथ उसे नष्ट करने का भी सिलसिला शुरू किया,तभी से अपने विनाश को भी आमंत्रित कर लिया ।

इच्छा या भावना से ही पाप-पुण्य का नाप होता है।

हम जिस इच्छा से, जिस भावना से जो काम करते हैं, उस इच्छा या भावना से ही पाप-पुण्य का नाप होता है। भौतिक वस्तुओं की तौल-नाप बाहरी दुनिया में होती है। भीतरी दुनिया में यह नाप-तौल नहीं चलती, वहाँ तो इच्छा और भावना की नाप-तौल है। इसी के मुताबिक पाप-पुण्य का जमा-ख़रच किया जाता है।