प्राचीनकाल में सुखद जीवन का सार

प्राचीनकाल में सुखद जीवन का सार यही था कि मानव प्राकृति के साथ आत्मिक संबंध स्थापित कर बहुत सीधा- सादा जीवन व्यतीत करता था। वह सिर्फ अपनी अनिवार्य आवश्यकताओं के लिए प्रकृति का उपयोग करता था और इसके लिए वह प्रकृति के प्रति कृतज्ञ होता था। उसकी इस भावना के फलस्वरूप उसके और प्रकृति के बीच आंतरिक संबंध कायम था।

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अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट कर रहे हैं

अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए हम धरती की जीवनदायी व्यवस्था में व्यवधान उपस्थित करने पर भी उतारू हो गए हैं। अपने भौतिक सुख-सुविधाओं के लिए उन्हीं प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट कर रहे हैं, जो प्रकृति ने स्वचालित संतुलन व्यवस्था के रूप में हमें दिए हैं।

प्राकृतिक संपदाओं के निर्बाध उपयोग विनाश का कारण है ।

मनुष्य ने हमेशा प्रकृति से लिया ही है। प्रकृति भी उदरतापूर्वक मनुष्य की हर आवश्यकता की पूर्ति करती रही है,परंतु जब से मनुष्य ने अपने भोग-विलास के लिए प्राकृतिक संपदाओं के निर्बाध उपयोग के साथ-साथ उसे नष्ट करने का भी सिलसिला शुरू किया, तभी से अपने विनाश को भी आमंत्रित कर लिया।

इच्छा या भावना से ही पाप-पुण्य का नाप होता है।

हम जिस इच्छा से, जिस भावना से जो काम करते हैं, उस इच्छा या भावना से ही पाप-पुण्य का नाप होता है। भौतिक वस्तुओं की तौल- नाप बाहरी दुनिया में होती है। भीतरी दुनिया में यह नाप-तौल नहीं चलती, वहाँ तो इच्छा और भावना की नाप-तौल नहीं चलती।

प्रचंड संकल्पशक्ति चाहिए।

दूसरों पर न सही अपने शरीर और मन पर तो अपना अधिकार है ही और उस अधिकार का उपयोग करने में किसी प्रकार का कोई व्यवधान व हस्तक्षेप कहीं से भी नहीं हो सकता। अभीष्ट दिशा में निर्भयता एंव निश्चिंतता के साथ बढ़ा जा सकता है। मात्र प्रचंड संकल्पशक्ति चाहिए।

मानवी मस्तिष्क एक यंत्रों की तरह कार्य करता है।

वस्तुतः मानवी मस्तिष्क एक यंत्रों की तरह कार्य करता है। उसमें उत्पन्न हुई कोई भी योजना कार्य रूप में परिणत होना चाहती है। अतः आरंभ से ही इस संबंध में सतर्कता बरतनी चाहिए कि मस्तिष्क में उत्कृष्ट विचारों का ही उदभव हो और निषेधात्मक विचार न आने पाएँ।

हींन भावना का शारीरिक एंव मानसिक दुर्बलता से घनिष्ठ संबंध है।

हींन भावना का शारीरिक एंव मानसिक दुर्बलता से घनिष्ठ संबंध है। इससे छुटकारा पाने के लिए आवश्यक है कि  जीवन के रीति-नीति बदली जाए। अपने स्वाभिमान बनाए रखते हुए दूसरों के गुणों की प्रशंसा की जाए। प्रायः देखने में आता है कि भौतिक मृगमरीचिका के चंगुल में फँसा हुआ व्यक्ति अपनी मनोदशा को असंतुलित कर बैठता है।