कभी किसी व्यक्ति ने किसी दूसरे को नहीं सिखाया…

कभी किसी व्यक्ति ने किसी दूसरे को नहीं सिखाया। हममे से प्रत्येक को अपने-आपको सिखाना होगा। बाहर के गुरु तो केवल सुझाव या प्रेरणा देने वाले कारण मात्र हैं, जो हमारे अंत:स्थ गुरु को सब विषयों का मर्म समझने के लिए उद्बोधित कर देते हैं। तब फिर सब बातें हमारे ही अनुभव और विचार की शक्ति के द्वारा स्पष्ट हो जाएँगी और हम अपनी आत्मा मे उनकी अनुभूति करने लगेंगे।

संसार में प्यार करने लायक दो ही वस्तुएँ है…

अगर आप अपनी ईमानदारी कायम नहीं रख पा रहे है और अगर बाहर से हर चीज करने के बाद भी आपको गलत परिणाम मिल रहे हैं तो अंदर कोई चीज गड़बड़ है, जिसे बदलने की जरूरत है। इस संसार में प्यार करने लायक दो ही वस्तुएँ है- (1) दु:ख (2) श्रम

जीवन के संघर्ष की कहानी…

जीवन के संघर्ष की कहानी किसी भी रोमांचक घटना से कम नहीं है। यह एवरेस्ट की चढ़ाई से भी दुरलंघ्य जैसी है, परंतु असंभव नहीं है। हाँ, कठिन एवं दुष्कर अवश्य है। जो इसे पार कर लेता है, वह फौलाद के समान सुदृढ़ एवं सशक्त हो जाता है। उसको फिर इससे भी बड़ी चुनौती मिलती है। थका देने वाली, डराने वाली एवं अति भीषण यह बड़े-बड़े शूरमाओ को चूर कर देती है, परंतु सबको नहीं कुछ होते हैं, जो हारने के लिए पैदा ही नहीं हुए होते। जीवन को खेल मानकर उसके सुख-दुःख के दोनों पहलुओं को अंत तक खेल के समान खेल लेते हैं ताकि दुःख के पल के अवरोध को न्यूनतम किया जा सके।

सच्चा पुरुषार्थी वास्तव मे वही है…

सच्चा पुरुषार्थी वास्तव मे वही है जो बार-बार असफलता को देखकर भी अपने प्रयत्न में शिथिलता न आने दे और हर असफलता के एक नये उत्साह से सफलता के लिय निरन्तर काम में जुटा रहना निराशा का सर्वश्रेष्ठ और सृजनानात्मक उपचार है। अपने को योग्य बनाकर पूरे संकल्प के साथ लक्ष्य की ओर बढ़ना होगा। सफलता की सिद्धि मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है।

उच्चतम आदर्श पर दृढ़ रहो…

डरो मत, यह न सोचो की कितनी बार आसफलता मिलेगी। चिंता न करो। काल अनंत है। आगे बढ़ो, बारंबार अपनी आत्मा पर बल दो। प्रकाश जरूर ही आएगी। स्वयं ही अपना उद्धार करो। मित्र, दूसरा कोई तुम्हें मदद नहीं कर सकता, क्योंकि तुम स्वयं ही अपने सबसे बड़े शत्रु और स्वयं ही अपने सबसे बड़े हितैषी हो। तो फिर आत्मा का आश्रय लो। उठ खड़े हो जाओ, डरो मत। वीरता के साथ आगे बढ़ो। उच्चतम आदर्श पर दृढ़ रहो। आज्ञापालक बनो। सत्य मानवता और अपने देश के प्रति चिरकाल तक निष्ठावान बने रहे।

सूर्य केवल आग का गोला नहीं, कर्म का देवता हैं…

सूर्य केवल आग का गोला नहीं, कर्म का देवता हैं। वह निरंतर कर्मरत रहता हैं, कभी कोई गड़बड़ी नहीं होती। वह निरंतर चलता है, प्रकाश और ऊर्जा बाँटता हैं। उसकी उपासना से जीवन उसके जैसा ही हो जाता हैं। हम सूर्य के उपासक हैं। हम भी निरंतर प्रकाश बाँटते रहें। सूर्य नहीं चाँद बनकर।

प्रेम कुछ पाने की इच्छा से नहीं किया जाता बल्की देने की भावना से किया जाता है…

प्रेम कुछ पाने की इच्छा से नहीं किया जाता बल्की देने की भावना से किया जाता है । प्रेम दान का नियम है जो निरंतर देता रहता है ,यदि लेता है तो केवल प्रेम ही । प्रेम की पूर्ति प्रेम से होती है । प्रेम साधना का दूसरा नियम है । सच्चा प्रेम वह है जो घर बाहर , मंदिर , मस्जिद समस्त जाति वर्ण में एक रस, एक समान व्याप्त होकर हमारी नस-नस मे समा जाय और जीवन का अंग बन जाय ।