सच्चे शिष्य

सच्चे शिष्य अपने आराध्य कई परिचेतनाकी उस अपूर्व वृष्टि का अनुभव करते हैं और कृत्य होते हैं। गुरु स्मृति मात्र सेही शिष्य की आँखे छलक उठती है, रोमाबलि पुलकित हो जाती है, भाव भीगने लगती है।

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मांसाहार, शराब, धूम्रपान, ये सभी रोगो तथा दु;ख की जर हैं…

मांसाहार, शराब, धूम्रपान, ये सभी रोगो तथा दु;ख की जर हैं। सात्विक भोजन से रक्त शुद्ध रहता है, तामसी भोजन से शरीर आलसी तथा रोगी रहता है। सात्विक भोजन से गरीबी भी दूर होती है।

धूर्त व्यक्ति की सोच…

धूर्त व्यक्ति अपनी चालाकियों से कुछ देर के लिए बड़ी-बड़ी बाते बनाकर, धन का अभिमान जताकर,रूप–गुण की झूठी प्रदर्शनी लगाकर कुछ थोड़ा सा सम्मान प्राप्त भी कर ले तो वह आंतरि उल्लाश नहीं मिल सकेगा जो मिलना चाहिये था।

प्रार्थना मानसिक स्वास्थ्य एवं आत्मविश्वास पर किस प्रकार प्रभाव डालती है…

प्रार्थना मानसिक स्वास्थ्य एवं आत्मविश्वास पर किस प्रकार प्रभाव डालती है , इसके पीछे वैज्ञानिक तथ्य यह है कि आईएसएमई प्राथी अपने भावों कि गहराई एमई प्रवेश करके परमात्मा को सर्वसम्मत मानते हुए शरणागत होकर अपनी भावभीव्यक्ति करता है । आमतौर से प्रार्थना सभी करते है और उसमे ईस्वर से कुछ याचना करते हैं । कभी ये प्रार्थना फलिफ़ुथ होती है ।

शिक्षा का महत्व…

शिक्षा का प्रयोजन छात्रो को कमाऊ बना देना भर नहीं होना चाहिए। यदि इतनी ही बात है तो उन्हे उतना श्रम कराने ओर समय गवाने की क्या आवश्यकता है। बाप दादों के धंधे मे कुशलता बिना पढ़े या कम पढ़े होने पर भी प्राप्त की जा सकती है और नौकरी मे मिलने वाली राशि की अपेक्षा आमदनी की जा सकती है।

गृहस्थ जीवन…

गृहस्थ जीवन को पृथ्वी पर स्वर्ग कहा गया है। मनुष्य का युग-युग का अनुभव बतलाता है कि जो सुख पारिवारिक जीवन जीने में है, वह किसी अन्य प्रकार की जीवन पद्धति में नहीं है। आश्रम व्यवस्था का प्रचलन करने वाले ऋषि-मुनियों ने गृहस्थ आश्रम को सबसे पुनीत एवं उपयोगी बताया है। जीवन की सारी व्यवस्था परिवार पर निर्भर रहती है। शेष तीन आश्रम भी गृहस्थ आश्रम पर निर्भर रहते आए हैं।

वृक्ष की सफलता उसकी जड़ पर निर्भर है…

जिस प्रकार वृक्ष की सफलता उसकी जड़ पर निर्भर है, उसी प्रकार मनुष्य की सफलता एवं सुख-शांति परिवार पर निर्भर है। यदि वृक्ष की जड़ कमजोर, अव्यवस्थित, शुष्क अथवा अनुपयुक्त हो तो वृक्ष किसी भी दशा में विकसित होकर फल-फूल नहीं सकता। परिवार के व्यवस्थित, सुसंस्कृत तथा उपयुक्त होने पर ही व्यक्ति जीवन में वांछित उन्नति की और बढ़ सकता है। मनुष्य के जीवन-विकास में परिवार का महत्त्वपूर्ण योगदान भी एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।