केवल संकल्प करते रहने वाला…

केवल संकल्प करते रहने वाला निरुधमी व्यक्ति उस आलसी व्यक्ति की तरह कहा जाएगा, जो अपने पास गिरे हुए आम को उठाकर मुह मे भी रखने की कोशिश नहीं करता और इच्छा मात्र से आम का स्वाद ले लेने की आकांक्षा करता है|

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अपनापन एवं प्यार एक ध्रुव हैं…

अपनापन एवं प्यार एक ध्रुव हैं। उनके ठीक विपरीत घृणा खड़ी होती है। इंसान इन दोनों ध्रुवों के बीच डोलता रहता है। इन दोनों में अपनापन ही अच्छा है। योगी कहते हैं कि जो इन दोनों अवस्थाओं से गुजर जाता है या पार हो जाता है, उसी के दिल मे प्रेम का अंकुर पनपता है। अतः प्रेम का दर्शन अत्यंत परिस्कृत एवं दिव्य है।

जिंदगी एक पहेली हैं…

जिंदगी एक पहेली हैं। इसके उजालो में अँधेरा भी लिपटा रहता हैं, सुख के साथ दुख भी जुड़ा रहता हैं। जो चमकता हैं उसका बुझना सुनिश्चित हैं, परंतु श्रेष्ठ कर्म की चमक कभी नहीं खोती। निष्काम सेवा का सौंदर्य कभी मलिन नहीं होता हैं। मानविये मुल्यों के गुणों का सौंदर्य कभी नष्ट नहीं होता हैं।

जो उच्च विचारों का वरण करना चाहते हैं…

जो उच्च विचारों का वरण करना चाहते हैं। श्रेय पथ पर चलना चाहते हैं, उन्हें सादगी अनिवार्यत: अपनानी पड़ेगी। अन्यथा लिप्सा–ललसाओं के अधड़ में उच्च विचार मात्र कल्पनाभर बनें रहेंगे तथा चरितार्थ होने की दिशा में दो कदम भी आगे बढ़ न सकेंगे।

ऊँचे आदर्शो के लिए और उत्कृष्ट सिद्धांतों के प्रति…

मनुष्य के जीवन मे अध्यात्म का प्रवेश हुआ या नहीं, इसे परखने के लिए सच्ची कसौटी यह है कि ये जाँचा जाए कि उसके अंतरंग में सच्चाई के लिए, ऊँचे आदर्शो के लिए और उत्कृष्ट सिद्धांतों के प्रति मर मिटने का जज्बा पैदा हुआ अथवा नहीं। अच्छी बाते सुनने में भले सभी को लगती हैं। पर उस राह पर चलने के लिए कदम कुछ ही क्रांतिकारियों के उठते हैं।

प्रबल इच्छाशक्ति…

संसार के सफलता का मूल मंत्र है- प्रबल इच्छाशक्ति इसी के बल पर विधा, संपति और साधनों का उपार्जन होता है। यही वह आधार है जिस पर आध्यात्मिक तपस्याएँ और साधनाएँ निर्भर रहती है।

आजीविका को चलाने के लिए उन्हीं कर्मो को करें जो धर्म के विरुद्ध न हों…

जैसे नगर का स्वामी नगर की रक्षा में और सारथी रथ की रक्षा में तत्पर रहता हैं वैसे ही बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि वह शरीर कि रक्षी के कार्यों में तत्पर रहें। अपनी आजीविका को चलाने के लिए उन्हीं कर्मो को करे जो धर्म के विरुद्ध न हों।