अपने को अपने तक ही सीमित रखने की नीति…

अपने को अपने तक ही सीमित रखने की नीति से मनुष्य एक बहुत बरे लाभ से वंचित हो जाता है, वह है-दूसरों की सहानुभूति खो बैठना। स्वार्थी व्यक्तियों कभी किसी का कुछ प्रत्यछ बिगार नहीं सकता, किन्तु अपने लिए सम्बद्ध व्यक्तयों की सदभावना खो बैठना ऐसा घाटा है, जिसके कारण उन सभी लाभों से वंचित होना परता है, जो सामाजिक जीवन मे पारस्परिक स्नेह–सहयोग पर टीके हुए हैं।

Advertisements

वर्तमान की ही अनेक समस्याएँ सुलझाने के लिए उलझी पड़ी हैं।

वर्तमान की ही अनेक समस्याएँ सुलझाने के लिए उलझी पड़ी हैं , तब भूतकाल की उन स्मृतियों को चिंता का विषय क्यों बनाएँ ? जो न तो सुलझ सकती है और न ही फिर से घटित होने के लिए वापस आ सकती है ।

अपने जीवन देवता से माँगो…

अपना उद्धार आप करो। अपनी प्रगति का पथ स्वंय प्रशस्त करो। जो माँगना है, अपने जीवन देवता से माँगो। बाहर दिखने वाली हर वस्तु का उदगमकेंद्र अपना ही अंतरंग है । आत्मदेव की साधना ही जीवनदेवता की उपासना है ।

निराशा, चिन्ता , आशंका, उद्धिग्रता जैसी………….

निराशा, चिन्ता , आशंका, उद्धिग्रता जैसी कुकल्पनाएँ मनोबल गिराती और अगणित हानियाँ उत्पन्न करती है , इस तथ्य को ध्यान में रखा जाए । सदा उज्जवल भविष्य के स्व्रप देखे जाएँ ।

सफलता और उन्नति के नशे मे मनुष्य झूमता रहता है।

सफलता और उन्नति के नशे मे मनुष्य झूमता रहता है, हर्षोल्लास और वैभव सुविधा के वातावरण में मनुष्य का केवल अहंकार ही बढ़ता है । अहंकारी को आत्मनिरीक्षण की फुरसत कहाँ ? उसे सुधारने – समझने का साहस कौन करे ?

अपने को बदलने के लिए विवश एंव बाध्य होना पड़ेगा…

अगले दिनों महकाल का वह क्रिया–कलाप सामने आने वाला है, जिसमें अगणित लोगो को अनेक प्रकार के कष्ट सहने पड़ेंगे। महायुद्ध, गृहयुद्ध, शीतयुद्ध , व्यक्तियुद्ध, प्रकृतियुद्ध आदि अनेक प्रकार के क्लेश, संघर्ष, उद्धेग, अवरोध सामने आने वाले हैं। इनसे हर व्यक्ति को ऐसे झटके लगेंगे की उसे विवशता अथवा स्वेच्छा से अपनी वर्तमान रीति- नीति बदलने के लिए विवश एंव बाध्य होना पड़ेगा ।

कर्तव्यों की उपेक्षा करने वाले अपना घोर अहित ही करते हैं…

गैर जिम्मेदार, लापरवाह और अपने कर्तव्यों की उपेक्षा करने वाले अपना घोर अहित ही करते हैं। चोर और चालाक होते हुए भी तत्पर व्यक्ति लाभदायक रहता है, किन्तु ईमानदार और भला व्यक्ति हुए भी गैरजिम्मेदारी का व्यवहार करने वाला अधिक हानिकारक सिद्ध होता है। आत्मा के प्रति हमारी जिम्मेदारी है, ईश्वर के प्रति भी । उन्हीं के कारण हमारा अस्तित्व है। आवश्यक है की हम आत्मा की आवाज सुनें और परमात्मा दवारा निर्धारित कर्तव्यों का पालन करते हुए मानव जीवन को सार्थक बनाएँ।