मनुष्य का गौरवपूर्ण परिभाषा…

हमें कोई गुमराह न कर सके, इतना हममें विवेक हो, कोई हम पर दबाव न डाल सके, इतना हममें आत्मबल हो, हम अपनी कृति को प्रामाणिक बना सके, इतना हममें आत्मविश्वास हो। हम अन्याय के विरुद्ध लड़ सकें इतना हममें शौर्य हो। हम अपने आदर्शमय पथ पर अडिग हो कर समुन्नत रहें, ऐसी हमारी साधना हो, पलायन नहीं संघर्ष, बुज़दिली नहीं साहस, अकर्मण्यता नहीं शौर्य ही मनुष्य का गौरवपूर्ण परिभाषा है।

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आचारवान व्यक्ति….

जिसे तुम अच्छा मानते हो यदि तुम उसे आचरण में नहीं लाते तो वह तुम्हारी कायरता है। हो सकता कि भय तुम्हें ऐसा न करने देता हो। लेकिन इनसे न तो तुम्हारा चरित्र ऊंचा उठेगा और न ही तुम्हें गौरव मिलेगा। मन में उठने वाले अच्छे विचारों को दबाकर तुम बार-बार जो आत्म हत्या कर रहे हो, आखिर उनसे तुमने किस लाभ का अंदाजा लगाया है। शांति और तृप्ति आचारवान व्यक्ति को ही प्राप्त होती है।

विचारों पर पैनी दृष्टि….

अपने विचारों पर पैनी दृष्टि रखें,क्योंकि ये एक दिन शब्द रूप में मुखरित होंगे । अपने शब्दों पर इससे भी पैनी दृष्टि रखें,क्योकि ये ही एक दिन कर्म रूप में प्रस्फुटित होंगे । अपने कर्मों पर उससे भी पैनी दृष्टि रखें,क्योकि ये ही आदतों में परिणत होते है । अपने आदतों पर और भी पैनी दृष्टि रखे,क्योकि आदतें ही चित्त में संस्कारों के रूप में जड़ जमा कर बैठ जायेंगी । इन्हीं संस्कारों से चरित्र का निर्माण होकर रहेगा । 

आकांक्षाओं से प्रेरित व्यक्ति …

क्षेष्ट आकांक्षाओं से प्रेरित व्यक्ति अपने जीवन मे उन चीजों को स्थान नहीं देते जिनसे समाज का अहित होता हो। उनका सारा समय,क्षमा,क्ष्रेष्ठता के अभिवर्धन में लगा रहता है। वे अपनी क्षमता एवं शक्ति का दुरुपयोग इन्द्रियों के भोग-लिप्सा की पूर्ति के लिए नहीं करते। वे अपनी शारीरिक एवं मानसिक शक्तियों का उपयोग क्ष्रेष्ठता की ओर बढ़ने में करते हैं।

धर्म का चमत्कार से कोई वास्ता नही है…

धर्म का चमत्कार से कोई वास्ता नही है| धर्म तो प्रकृति द्वारा निर्मित विधि है| इसे समझने-स्वीकारने से हमारा जीवन ही कल्पतरु बन जाता है| अपने आप ही धर्म हमें–हममें से हरेक को मनोवांछित फल देने लगता है| धर्म किसी को आश्रित, परमुखापेक्षी, पारावलंबी नही बनाता। यह तो जीवन को परम स्वतंत्र व संपूर्ण रूप से मुक्त करता है

हमें स्वयं को समझना है…

यदि हमें स्वयं को समझना है, जानना है, तो सबसे पहले हमें अपने जीवन के नजदीक आना होगा और इसके लिए है – उपासना, आत्मबोध-तत्वबोध की साधना। थोड़ा समय अपने बारे में सोचें कि हम क्या हैं ? हम ऐसे क्यों हैं ? हम क्या कर सकते हैं ? हमारे भीतर क्या संभावनाएं हैं ? उन्हें किस तरह से निखारना है ? और इसके लिए जो एक आदर्श विधि- व्यवस्था परमपुज्य गुरुदेव बताते हैं, उसमें चार बातें हैं – 1. श्रम, 2. सेवा, 3. सदाचार, 4. स्वाध्याय

प्रतिभा तेजस्विता को कहते हैं…

प्रतिभा तेजस्विता को कहते हैं। यह चेहरे की चमक या चतुरता नहीं, वरन मनोबल पर आधारित ऊर्जा है। तेजस्विता तपश्चर्या की उपलब्धि है, जो निजी जीवन में संयम-साधना और सामाजिक जीवन में परमार्थपरायणता के फलस्वरूप उदभूत होती है। संयम अर्थात अनुशासन का, आत्मनियंत्रण होती है। संयम अर्थात अनुशासन का, आत्मनियंत्रण का कठोरतापूर्वक परिपालन। जो इतना कर सकें, उन्हीं से परमार्थ साधता है।