भगवान, सत्य, भलाई एवं धर्मादि हम में ही विद्यमान है।

हम जानते हैं कि सूर्य हमारे सिर पर होता है तब कोई छाया नहीं होती, फिर भला जब भगवान, सत्य, भलाई एवं धर्मादि हम में ही विद्यमान है तो अशुभ कहाँ ?

Advertisements

तुम्हीं अपने भाग्य के विधाता हो।…

खेड़े होओ ,साहसी बनो ,शक्तिमान होओ | सारा उत्तरदायित्व अपने कंधे पर लो, और जान लो कि तुम्हीं अपने भाग्य के विधाता हो। तुम्हें जो कुछ बल और सहायता चाहिए, सब तुम्हारे ही भीतर है | अतएव अपना भविष्य तुम स्वयं गढ़ो।

आज हम पाखंड के बल पर अपने देश को उन्नति के शिखर पर नहीं पहुंचा सकते है।

आज हम पाखंड के बल पर अपने देश को उन्नति के शिखर पर नहीं पहुंचा सकते है। हम आत्याचारों से पीड़ित है। हमे अपने इस अवगुण को दूर करके देश की भलाई के लिए सख़्त कदम उठाना चाहिए। इस कथन की पुष्टि प्रेम, सत्य और अहिंसा के बल पर संप्पन हो सकते है न कि झूठ,पाप और हिंसा के बल पर।

जिस व्यक्ति में आत्मविश्वास नहीं है, वह व्यक्ति नास्तिक है ।

जिस व्यक्ति में आत्मविश्वास नहीं है, वह व्यक्ति नास्तिक है। ग्रन्थों में कहा गया है जो व्यक्ति ईश्वर में विश्वास नहीं करता, वह भी नास्तिक होता है, लेकिन नूतन धर्म का कहना है कि जो मनुष्य अपने आप पर विश्वास नहीं करता है, वह महानास्तिक व्यक्ति होता है।

विचार सृजनात्मक शक्ति है।

विचार व्यर्थ के मनोरंजन समझे जाते हैं, पर वस्तुतः उनकी सृजनात्मक शक्ति अनंत है। वे एक प्रकार के चुंबक हैं, जो अपने अनुरूप परिस्थितियों को कहीं से भी खींच बुलाते हैं। विचार प्रवाह ही व्यक्ति का स्तर विनिर्मित करता है। क्षमताएँ उसी के आधार पर उत्पन्न होती हैं, जैसा की सोचा और चाहा गया था।

गुरु-शिष्य संबंध….

गुरु-शिष्य संबंध बड़ा कोमल, किन्तु कल्याणकारी होता है। गुरु शिष्य को पुत्रवत समझकर, उसे टेढ़े-मेढ़े मार्गों से निकाल ले जाते हैं, जिन्हें शिष्य के लिए समझ पाना कठिन होता है। इसलिए कई बार शिष्य अभिमान में आकर गुरु कि अवज्ञा कर जाता है, इच्छा तथा आदेश कि अवहेलना करता है। यदपि गुरु उसे कुछ भी न कहें किन्तु फिर भी वह संभावित लाभ से वंचित रह जाता है। इसके लिए शिष्य में गुरु के प्रति सम्पूर्ण समर्पण की आवश्यकता है।