मुझे आज क्या करना है,

प्रात: काल उठते ही यह सोचना चाहिये कि मुझे आज क्या करना है, मैंने आज क्या सत्कर्म किया है, क्योंकि प्रतिदिन आयु का एक भाग क्षीण हो जाता है।

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मनुष्य भी अभीष्ट उद्देश्यों में चरम सफलता प्राप्त कर सकता है।

आलस्य में शरीर कि और प्रमाद में मन कि क्षमता को नष्ट होने से बचा लिया जाए तो सामान्य स्तर का मनुष्य भी अभीष्ट उद्देश्यों में चरम सफलता प्राप्त कर सकता है। समय ही ईश्वरप्रदत वह क्षमता है, जिसका उपयोग करके मनुष्य जिस प्रकार कि भी सफलता प्राप्त करना चाहे, उसे प्राप्त कर सकता है।

यदि भारत को अपना अस्तित्व बनाए रखना है…

यदि भारत को अपना अस्तित्व बनाए रखना है और विश्व में अपना निर्धारित कार्य करना है तो हमारी पहली आवश्यकता होगी कि भारत का युवा वर्ग विचार करना सीखे – सभी विषयों पर विचार करना, स्वतंत्र रूप से, वस्तुओं कि तह तक जाकर, पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर, हर प्रकार कि रूढ़िवादिता को मानो भीम कि गदा के प्रहार से चूर-चूर करते हुए।

हम अपनी आकांक्षाओं को उच्चस्तरीय दिशा दें…

हम सबके जीवन में घटनाएँ संस्कारवश घटती हैं। किसी प्रयोजन के निमित्त घटती होती हैं, अगर हम अपनी आकांक्षाओं को उच्चस्तरीय दिशा दें तो हम भी जीवनमुक्त एवं बंधनमुक्त हो सकते हैं।

घटनाएँ संस्कारवश घटती हैं……

हम सबके जीवन में घटनाएँ संस्कारवश घटती हैं। किसी प्रयोजन के निमित्त घटती होती हैं, अगर हम अपनी आकांक्षाओं को उच्चस्तरीय दिशा दें तो हम भी जीवनमुक्त एवं बंधनमुक्त हो सकते हैं।

ध्यान एक सुखद एहसास…………………..

ध्यान सभी प्रकार के मनोविकारों की चिकित्सा पद्धति है। इससे सभी विकार समाप्त होते हैं। ध्यान एक सुखद एहसास है। निश्चल, नीरव, निर्विकार, निर्दोष भाव में माँ के पेट में बैठे होने का एहसास सतत करें। पवित्रता का छोटा-सा एहसास जीवन की सारी अपवित्रता को मिटाने में साक्षम है।

जब आप में निष्ठा, प्रज्ञा और श्रद्धा हो

गायत्री को पारस कहा जाता है। इसे छूकर लोहा सोना बन जाता है। परिष्कृत व्यक्तित्व हो जाता है। गायत्री को कल्पवृक्ष कहा जाता है। मनोकामनाओं की पूर्ति होती है, यदि आत्मशोधन कर लिया हो तो। गायत्री को अमृत कहा जाता है। इसे पीकर आजर, अमर, चिरयुवा बना जा सकता है। यह सब तभी संभव है जब आप में निष्ठा, प्रज्ञा और श्रद्धा हो।