साधना यदि निरंतर बनी रहे तो इससे अंतः करण में भगवती की कृपा का वातावरण होता हैं।

साधना यदि निरंतर बनी रहे तो इससे अंतः करण में भगवती की कृपा का वातावरण होता हैं। इससे भ्रम, भय, संदेह मिटते हैं। चित्त प्रकिशित होने के कारण साधक अपनी अंतर्प्रज्ञा के समक्ष अपनी जिज्ञासा रख पाने में समक्ष हो पाता हैं। यही नहीं उसे अपनी जिज्ञासा का समाधान पाने के उचित अवसर प्राप्त होते हैं।

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भगवान जब आते हैं, तो आपको बाध्य कर देते है ।

आपकी समीक्षा करने के लिए, आपके दोष और दुर्गुणों को देखने के लिए, आपको बेहतरीन बनाने के लिए, भगवान जब आते हैं, तो आपको बाध्य कर देते है और निरंतर यह कहते है कि अपने आप को धो, अपने को साफ कर, अपने को उज्ज्वल बना, ताकि मै तुझे गोदी मे लेने मे समर्थ हो सकूँ।

जो स्वतन्त्रता के आनंद की फसल चाहते है ।

जो स्वतन्त्रता के आनंद की फसल चाहते है ,उन्हें ऐसे बीज बोने और उसकी रक्षा करने के लिये अधिक परिश्रम और अतोला बलिदान देना होगा । अंधविश्वास और रूढ़िवाद पर आधारित शासन जनहित का संपदान नहीं कर सकता और न उग्रवादी शासन अपनी रक्षा कर सकता हैं ?

भावना ही तो वह भावना है।

स्वार्थ भावना ही तो वह भावना है जो मनुष्य को शोषण,संचय चोरी,ठगी तथा भ्रष्टाचार के पापों के लिए प्रेरित करती है । यही तो वह पाप है जिसके वशीभूत होकर मनुष्य अत्याचारी, आक्रमणकारी तथा अनचारी बन जाता है ।

हंसी उतनी ही………

हंसना एक सकारात्मक सोच है, एक रचनात्मक क्रिया है ,जिसमे जीवन का उल्लास,उमंग एवं प्रसन्नता छिपी रहती है। हंसना ठीक है पर पर ध्यान रहे कि किसी की कमजोरी पर नहीं हंसना नहीं चाहिए, किसी पिरित इंसान की पीड़ा पर नहीं हंसना चाहिए। हंसना आंतरिक प्रसन्नता की निशानी है, जो व्यक्ति मानसिक एवं भावनात्मक रूप से जितना अधिक स्वस्थ होता है, उसकी हंसी उतनी ही निस्छल एवं निर्मल होती है ।

जो स्वतन्त्रता के आनंद की फसल चाहते है……..

जो स्वतन्त्रता के आनंद की फसल चाहते है ,उन्हें ऐसे बीज बोने और उसकी रक्षा करने के लिये अधिक परिश्रम और अतोला बलिदान देना होगा । अंधविश्वास और रूढ़िवाद पर आधारित शासन जनहित का संपदान नहीं कर सकता और न उग्रवादी शासन अपनी रक्षा कर सकता हैं ?

जीवन एक संग्राम है…

जीवन एक संग्राम है, जिसमें विजय केवल उन्हीं को मिलती है, जो दृढ़ और उन्नत मनोबल का कवच धारण किए रहते हैं और जो अपने निहित पराक्रम और पौरुष की उत्कृष्टता सिद्ध करते हैं ।शारीरिक स्वास्थ ठीक हो, पर मनोबल न हो , तो आदमी मानसिक आघात से अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है । अविकसित मनोबल होने के कारण हमारी योजनाएँ सफल नहीं होती । हमारा मन हारा रहता है तो शरीर भी हारता है और हम पराजित हो जाते हैं ।