संस्कारों के अधीन होता है।

व्यक्ति अपने भाग्य का निर्माता आप है,किन्तु यह वाक्य केवल तपस्वियों पर ही लागू होता है,जो अपनी प्रचंड तप-ऊर्जा द्वारा इन संस्कारों को नष्ट करने की क्षमता रखते हैं। तपस्वी अपने जीवन की दिशा स्वयं निर्धारित करते हैं ,किन्तु सामान्य व्यक्तियों का जीवन तो पूर्णत: संस्कारों के अधीन होता है।

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