विद्यार्थियों का जीवन लक्ष्य न केवल परीक्षा में उत्तीर्ण होना,…

विद्यार्थियों का जीवन लक्ष्य न केवल परीक्षा में उत्तीर्ण होना, स्वर्ण पदक प्राप्त करना है, अपितु देशसेवा की क्षमता एवं योग्यता अर्जित करना भी है।

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सच्ची शिक्षा।

जो शिक्षा साधारण मनुष्य में चरित्रबल, परहित भावना तथा सिंह के समान साहस नहीं ला सकती, वह भी कोई शिक्षा है ? जिस शिक्षा के द्वारा जीवन में अपने पैरों पर खड़ा हुआ जाता है, वही सच्ची शिक्षा है। अपने से निम्न श्रेणी वालों के प्रति हमारा एक ही कर्त्तव्य है, उनको शिक्षा देना । उनमें विचार पैदा कर दो, शेष सब उसके फलस्वरूप आ जाएगा।

मानसिक कमजोरी से चिंताएँ सताती हैं।

निर्बलता पाप है। पापी व्यक्ति की तरह निर्बलता को भी पृथ्वी पर सुख से जीने का अधिकार प्रकृति नहीं देती है। शरीर की कमजोरी से रोग घेरते है। मानसिक कमजोरी से चिंताएँ सताती हैं। अपनी बौद्धिक क्षमताएँ दुर्बल पड़ी हों तो यह निश्चित है की आप पराधीनता के पाश में जकड़े होंगे।

व्यवहारिक दृष्टि से भी एकाकी योगदान निष्फल नहीं जाते।

व्यवहारिक दृष्टि से भी एकाकी योगदान निष्फल नहीं जाते। रीछ-वानर जानते थे की हमारी शक्ति है, फिर भी उन्होने लंकाविजय की योजना बनाई और उस पर कम किया । साधनहिन और शक्तिहीन रीछ-वानरो ने समर्थ शक्तिशाली प्रतिपक्ष को किस प्रकार परास्त किया।

वेदों का सार गायत्री है।

जिस प्रकार पुष्पों का सार शहद, दुग्ध का सार घृत है ,उसी प्रकार वेदों का सार गायत्री है। सिद्ध की हुई गायत्री कामधेनु के समान है। गंगा शरीर के पापों को निर्मल करती है, गायत्री रूपी ब्रहमगंगा से आत्मा पवित्र होती है । जो गायत्री छोड़कर अन्य उपासनायें करता है , वह पकवान छोड़कर भीक्षा मांगने वाले समान मूर्ख है । काम्य सफलता तथा तप की वृद्धि के गायत्री से श्रेष्ठ और कुछ है नहीं ।

गायत्री आत्मा का परम शोधन करने वाली शक्ति है |

गायत्री आत्मा का परम शोधन करने वाली शक्ति है | उसके प्रताप से कठिन दोष और दुर्गुणों का परिमार्जन हो जाता है |जो मनुष्य गायत्री तत्व को भलीप्रकार समझ लेता है ,इसके लिए इस संसार में कोई दुख शेष नहीं रह जाता है |

विजय केवल उन्हीं को मिलती है, जो दृढ़ और उन्नत मनोबल का कवच धारण किए रहते हैं।

जीवन एक संग्राम है,जिसमें विजय केवल उन्हीं को मिलती है, जो दृढ़ और उन्नत मनोबल का कवच धारण किए रहते हैं और जो अपने निहित पराक्रम और पौरुष की उत्कृष्टता सिद्ध करते हैं ।शारीरिक स्वास्थ ठीक हो, पर मनोबल न हो,तो आदमी मानसिक आघात से अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है । अविकसित मनोबल होने के कारण हमारी योजनाएँ सफल नहीं होती । हमारा मन हारा रहता है तो शरीर भी हारता है और हम पराजित हो जाते हैं ।