अपने आचरण और विचार को कर्तव्य धर्म से नियंत्रित करो ।

अपने हृदय की जाँच न कर दूसरों के मन की अवस्था की चिन्ता करने में कोई लाभ नहीं । अपने आचरण और विचार को कर्तव्य धर्म से नियंत्रित करो ।

प्रकृति देवमाता है।

हमें यथार्थ में प्रसन्नता प्रकृति के सानिध्य से मिलती है। जितना हम प्रकृति से दूर जा रहे हैं, बनावटी दुनिया में जी रहे हैं, उतना ही तनाव में जी रहे हैं। प्रकृति को इसलिए अदिति – देवमाता कहा जाता है।

आत्मा से वरिष्ठ केवल एक ही शक्ति है – परमात्मा ।

आत्मा से वरिष्ठ केवल एक ही शक्ति है – परमात्मा । और किसी के सामने हाथ फैलाने, माँगना, याचना करना मनुष्यों को शोभा नहीं देता।

मन इन्द्रियों का नियामक,नियंत्रक एवं संचालक है ।

इन्द्रियों की तृप्ति मन के ऊपर निर्भर करती है । मन की तृप्ति संभव है,क्योंकि मन इन्द्रियों का नियामक,नियंत्रक एवं संचालक है ।

कितने मनुष्यों का एक सुसंगठित

जिस प्रकार अनेक पुरज़ों के मिले बिना कोई मशीन नहीं बन सकती , उसी प्रकार कितने मनुष्यों का एक सुसंगठित संगठन बने बिना युग निर्माण जैसे महान कार्य में सफलता संभव नहीं ।

छोटे- छोटे कर्मफलों के लिए……….

इस चिर – दुर्लभ मानव जीवन को पाकर जो छोटे- छोटे कर्मफलों के लिए लालायित रहता है , वह परमात्मा के साक्षात्कार जैसे परम लाभ से वंचित रह जाता है ।

तिनके के समान हलका बनने शीघ्र सफल होती है ।

तिनके के समान हलका बनने से, वृक्ष के समान सहिष्णु बनने से , दूसरों को मान देने से , इष्ट की महिमा समझने से तथा अभिमान का त्याग करने से साधना शीघ्र सफल होती है ।

हमें कोई गुमराह न कर सके, इतना हममें विवेक हो।

हमें कोई गुमराह न कर सके, इतना हममें विवेक हो, कोई हम पर दबाव न डाल सके, इतना हममें आत्मबल हो, हम अपनी कृति को प्रामाणिक बना सके, इतना हममें आत्मविश्वास हो। हम अन्याय के विरुद्ध लड़ सकें इतना हममें शौर्य हो। हम अपने आदर्शमय पथ पर अडिग हो कर समुन्नत रहें, ऐसी हमारी साधना हो, पलायन नहीं संघर्ष, बुज़दिली नहीं साहस, अकर्मण्यता नहीं शौर्य ही मनुष्य का गौरवपूर्ण परिभाषा है।

अपने भाग्य और भविष्य ……..

समय ही जीवन है,समय ही उत्कर्ष है समय ही उच्चतम शिखर तक चढ़ दौड़ने का सोपान।महाकाल का जो स्वरूप समझा सका है उसी को मृत्युंजयी बनने का सौभाग्य मिला है, और किसी के साथ भी मखौल किया जा सकता है, पर महाकाल के साथ नहीं। समय के दुरुपयोग की भूल अपने भाग्य और भविष्य को ठुकराने और लतियाने की तरह है। जो समय गँवाता है, वह प्रकारांतर से अपने उत्कर्ष और आनंद का द्वार ही बंद करता है।