अच्छे विचारों को दबाकर आप आत्म हत्या कर रहे है

जिसे तुम अच्छा मानते हो यदि तुम उसे आचरण में नहीं लाते तो वह तुम्हारी कायरता है। हो सकता कि भय तुम्हें ऐसा न करने देता हो। लेकिन इनसे न तो तुम्हारा चरित्र ऊंचा उठेगा और न ही तुम्हें गौरव मिलेगा। मन में उठने वाले अच्छे विचारों को दबाकर तुम बार-बार जो आत्म हत्या कर रहे हो, आखिर उनसे तुमने किस लाभ का अंदाजा लगाया है। शांति और तृप्ति आचारवान व्यक्ति को ही प्राप्त होती है।

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प्रकृति और जीवन सभी नियमों से बँधे हैं।

प्रकृति और जीवन सभी नियमों से बँधे हैं। यहाँ पर नियम चलते हैं। जो नियमों का सही पालन कर लेता है, वही सफल होता है। बीज,वृक्ष और बीज के बीच की प्रक्रिया प्राकृतिक नियमों के अनुरूप होती है और ये हर अवस्था में एकदूसरे से अविच्छिन्न रूप से सबंधित होते हैं।

विवेकवान पैसे का उपयोग समझते हैं।

विवेकवान पैसे का उपयोग समझते हैं। उसे नीतिपूर्वक ही कमाते हैं और नीति-मर्यादा के अनुरूप ही ख़रच करते हैं। अपव्यय का समर्थन चाटुकार, चापलूस ही कर सकते हैं। जिनका उससे कुछ निजी स्वार्थ साधता हो, वे भी उसके लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं। पर विचारशीलों की बिरादगी में ऐसा बचकानापन ओछी बुद्धि का ही चिन्ह माना जाएगा।

लक्ष्य का निर्धारण हमेशा अपनी शक्ति ………….

सफलता के लिए ज़रूरी है हम अपनी जमीनी हकीकत पहचाने और अपने शक्ति और सामर्थ्य को भी जाने. सपने अवश्य देखने चाहिए पर जीवन की कठोर सच्चाइयों का ज्ञान भी होना चाहिए. लक्ष्य का निर्धारण हमेशा अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार करना चाहिए अन्यथा असफलता का सामना करना पड़ सकता है और इसकी वज़ह से हम निराशा से गिर सकते हैं. इसलिए सफलता के लिए अपनी strengths and weaknesses जानना बहुत ज़रूरी है.

सफलता पाने के लिए दृढ़ संकल्प का होना बहुत आवश्यक है.

सफलता पाने के लिए दृढ़ संकल्प का होना बहुत आवश्यक है. यह दृढ़ संकल्प ही होता है जिसकी वज़ह से व्यक्ति सफलता के मार्ग में आने वाली हर चुनौती, संकट और विपत्ति का हिम्मत, धैर्य और साहस के साथ सामना कर पाता है.

छात्र को संकीर्ण सीमा से निकालकर उसे मानवतावादी बनाना है।

शिक्षा का मूल उद्देश्य मस्तिष्क को ज्ञान से भरना नहीं, अपितु जन्मजात सुप्त दैवीय शक्ति को विकसित करके छात्र को आध्यात्मिक पूर्णता की ओर अग्रसर कराना है तथा छात्र को संकीर्ण सीमा से निकालकर उसे मानवतावादी बनाना है।

यदि पढ़ने का चस्का लगायें ……..

यदि हम चाहते हैं कि हमें कोई चस्का लगे, जो प्रत्येक दशा में हमारा सहारा हो और जो जीवन में हमें आनंद और प्रसन्नता प्रदान करें, उसकी बुराइयों से हमें बचाएं, हमें चाहिए कि हम पढ़ने का चस्का लगायें।