जिसकी आकांक्षाएँ जीवित है ,वह जीवित मनुष्य है ।

जिसकी आकांक्षाएँ जीवित है ,वह जीवित मनुष्य है ।जिसकी आकांक्षाएँ मर गई वह जीवित मृतक हो जाएगा ।जीवन का उदेश्य विकास करना है ,अणु से विभु ,लघु से महान ।उन्नति करना ,आगे बढ़ना, पुरुषार्थ पारायण होना ।आप इस मार्ग पर बढ़ते चलिए ।जीवन जैसी अमूल्य निधि को व्यर्थ मत जाने दीजिये ।अपने को समृद्ध और संपदाओ को परिपूर्ण बनाए ।

सबके पास जाकर कहो ,उठो जागो और सोओ मत

सबके पास जाकर कहो ,उठो जागो और सोओ मत ।संपूर्ण अभाओ और दुःख नष्ट करने की शक्ति तुम्हीं में है , इस बात पर विश्वास करने ही से वह शक्ति जाग उठेगी । सदा विस्तार करना ही जीवन है और संकोच मृत्यु ।हमारे अंदर अनंत शक्ति अपार ज्ञान ,अदम्य उत्साह वर्तमान है और अपने शक्ति को जगाओ ।

पुष्पों के समान हैं।

विद्वान पुरुष सुगंधित
पुष्पों के समान हैं। वे जहाँ जाते हैं,वहीं आनंद साथ ले जाते हैं। उनका सभी जगह घर है और सभी जगह विदेश है। विधा
धन है,अन्य वस्तुएं तो उसकी तुलना में तुच्छ हैं। यह धन ऐसा
है जो अगले जन्मों तक भी साथ रहता है।

कथनी और करनी का मेअंतर न हो।

तुम आदर्शों की बात करो और उन्हें अपने व्यवहार में न उतरो तो तुमसे चोर,डाकू और लुटेरे अच्छे हैं,जिनमें कम से कम कथनी और करनी का अंतर तो नहीं होता।

व्यक्ति के अंदर ईश्वर में निहित तमाम शक्तियाँ,सद्गुण एंव क्षमताएं बीजरूप में भरी पड़ी हैं।

व्यक्ति के अंदर ईश्वर में निहित तमाम शक्तियाँ,सद्गुण एंव क्षमताएं बीजरूप में भरी पड़ी हैं। बस,उन्हें समझना,कुरेदना,सजाना-संवारना और विकसित करना भर है। अपने व्यक्तित्व के विभिन्न अंग-अवयवों,पहलुओं के प्रति सजग होते हुए एवं उनके सदुपयोग एवं सुनियोजन की कसरत करते हुए यह सहज ही संभव हो जाता है।

हर काम को तीन अवस्थाओं में से गुज़रना होता है ।

हर काम को तीन अवस्थाओं में से गुज़रना होता है — उपहास, विरोध और स्वीकृति। जो मनुष्य अपने समय से आगे विचार करता है, लोग उसे निश्चय ही ग़लत समझते है। इसलिए विरोध और अत्याचार हम सहर्ष स्वीकार करते हैं; परन्तु मुझे दृढ और पवित्र होना चाहिए और भगवान् में अपरिमित विश्वास रखना चाहिए, तब ये सब लुप्त हो जायेंगे।

जो महापुरुष प्रचार-कार्य के लिए अपना जीवन समर्पित कर देते हैं।

जो महापुरुष प्रचार-कार्य के लिए अपना जीवन समर्पित कर देते हैं, वे उन महापुरुषों की तुलना में अपेक्षाकृत अपूर्ण हैं, जो मौन रहकर पवित्र जीवनयापन करते हैं और श्रेष्ठ विचारों का चिन्तन करते हुए जगत् की सहायता करते हैं। इन सभी महापुरुषों में एक के बाद दूसरे का आविर्भाव होता है–अंत में उनकी शक्ति का चरम फलस्वरूप ऐसा कोई शक्तिसम्पन्न पुरुष आविर्भूत होता है, जो जगत् को शिक्षा प्रदान करता है।